about 2 years ago - 3 comments
रोज देखता हूँ कुछ कुछ रेंगते हुए लोग और उनसे लिपट कर रेंगते हुए कुछ और लोग. दिन रात बस उन्हीं से पाला पड़ता है मुझे मैं भी उनसे डरकर अब रेंगना सीख रहा हूँ. मुझे याद आता है वो दिन भी जब जोड़ से पत्थर उठा कर फेंका था उस कीचड़ उछाल कर जाती
about 2 years ago - 1 comment
मुझे चाहिये एक अच्छा सा रोजगार क्योंकि मैं अच्छा पैसा कमाना चाहता हूँ चाहिये एक अच्छी गाड़ी और एक अच्छा घर एक अच्छी सी पत्नी और अच्छे बच्चे भी और इससे अच्छा क्या होगा मेरे लिये? यूँ तो मुझे तब भी अच्छा लगता है जब कोई बाजी लगाता है देश के लिये या हटाता है
about 2 years ago - 2 comments
कितना प्यार तुम्हें करता हूं जानू तुम्हें पता है? एक दिन मुर्गा जोश में मुर्गी से ऐसा ही कहता है. मुर्गी थोड़ा शरमायी और फिर थोड़ा इतरायी और फिर वही “पुरातन सवाल” झट से जा दुहरायी. “अच्छा मेरे लिए कुछ भी कर सकते हो?” मुर्गे ने “हाँ” कह अपना सीना ज्यों ही फुलाया. “अच्छा तो अंडा
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रात बहुत अंधियारी थी और इन्द्रदेव का मूड अलग था नही जानता मैं अज्ञानी कि प्रसन्नता या कुछ कारण और. झम झम करके रही नाचती सुकुमारी बरखा सारी रात. बिजली रानी के वियोग में नही सूझते हाथों को हाथ. बात राज की बतलाऊंगा अब हँसना ना तुम हे प्रिय सिरमौर. कल रात स्वामिनी मेरे घर
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जय होगी हमारी निश्चित ही पर निर्णय लेना होगा यह कि कितना स्वार्थ समोचित है. है नही दोष निज उन्नति में जब तक न पाप समाहित हो करता यह जन-कल्याण ही है. यदि शिक्षा एक साधन हो बस कुटुम्ब पालन का तो इतर कहाँ हम पशुओं से. हैं गिले व शिकवे सबको यहाँ और दोष
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कितना अच्छा होगा जब एक ही किताब पढ़ायी जायेगी दिल्ली से सुदूर गाँव तक. बिजली का क्या है दिल्ली में भी कायम नही रहती. रास्ते में गड्ढे के लिये भी जरूरी नहीं है किसी गाँव मे होना. हस्पताल के दरवाजे पर मरने के लिये कहीं और जाने की जरूरत नहीं. राख़ आँखों मे उड़ कर
about 2 years ago - 2 comments
लगे आपको “अप्रतिम” वह शब्द कहाँ से लाऊँ मैं. स्वरचित अज्ञान शिविर में जब तड़प रहा हूँ हर दिन मैं. अतुल्य लगे जो पाठक को और जलाये दीप तिमिर में वह कविता कैसे बनाऊँ मैं. शब्द नहीं हैं पास मेरे भाव गये कब के संग छोड़. लिखना नहीं चाहता हूँ मैं पर जब दबते हाथों
about 2 years ago - 5 comments
एक लड़की पर तेज़ाब डाला गया. दूसरी जींस पहन कर घूम रही थी. तीसरी ने अपनी माँ की हत्या कर दी. चौथी को ससुराल में जला दिया गया. पाँचवीं को सेना मे भरती किया गया है. छठी ने अपने पति को मार दिया. सातवीं ने पति के साथ जान दे दी. आठवीं मेरे साथ ही
about 2 years ago - 1 comment
कुछ दिनों से सोच रहा था क्या क्या नहीं किया कितने सालों से. कि हल्के से यह दिल भींचा आंख मली कि समझ ना ले कोई कि वह कचरा नहीं था, दो बूँदें थीं. अब यह बूँदें यूँ ही आती हैं. वैसे नही, जैसे आते थे गिरने पर आंखों में सरसों के कीड़े. अब नही
about 2 years ago - 12 comments
इधर कुछ बकवास कवितायें पढ़ने को मिली, तो सोचा पोपुलारिटी बढ़ाने के लिए हम भी एक बकवास लिखें. हो सकता है पहले भी लिखा हो जिसके बारे में शायद मुझे भान न हो. यदि आपको हुआ हो तो कृपया न बताएं. आदमी खुशफ़हमी में जिए तो ज्यादा जीता है. तो लीजिये पेश है…… चाहे सैनी
about 2 years ago
waah bhai waah
kya baat hai
about 2 years ago
बेहतरीन!!