अरसा हो गया जुगनू नहीं दिखा
ना ही गोरैया दिखी सालों से जंगलों पर.
हमने ऐ सी लगवा लिया है घरों में
और बुन दिए दरवाजे और खिड़कियाँ.
काली रात में हमसे खेलने
करौंदे के जंगलों से आया करते थे
पर उन्हें कटवाना जरूरी था
क्योंकि मच्छरों का खतरा बहुत है.
नींद बमुश्किल आती है पंखों के नीचे
पर नामुमकिन है घर के आगे पेड़ लगाना.
कौन समझेगा हमारी मजबूरियां
एक गराज का होना कितना जरूरी है.
कोलेस्ट्रोल से लड़ने के लिए टहलना जरूरी है
पर इतनी धूल में जाऊं तो दमा ले आऊँ.
पर क्या आसान है बिना कार के जीना
साईकिल और रिक्शा में वो आराम कहाँ.
सहूलियत कितनी महंगी पड़ रही हमको
धरती के जीव हैं पर यही नुक्सान करती है.
हाँ सच है कभी बन्दर हुआ करते थे हम
पर नोचा तो हमने इंसानियत के बाद ही इसे.
himanshu
on May 20th, 2009
@ 10:03 pm:
भौतिक सुख समृद्धि की दुनिया में ऐसा ही होता है/ऐसा ही होगा ।
’अजहूँ चेत गँवार’ ।
समीर लाल
on May 20th, 2009
@ 11:20 pm:
यही विकास की कीमत है, जो हम चुका रहे हैं. फ्री में तो कुछ भी नहीं हासिल.
akhileshwar pandey
on May 21st, 2009
@ 1:23 am:
कौतूक भाई आपके कोरे विचार प्रभावित करते हैं। शुभकामना।
prithvi
on May 22nd, 2009
@ 10:12 am:
यही विकास मान लिया गया है और इसी विकास की कीमत हम चुका रहे हैं ..
सुंदर बात