एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
तरक्की
अरसा हो गया जुगनू नहीं दिखा
ना ही गोरैया दिखी सालों से जंगलों पर.
हमने ऐ सी लगवा लिया है घरों में
और बुन दिए दरवाजे और खिड़कियाँ.
काली रात में हमसे खेलने
करौंदे के जंगलों से आया करते थे
पर उन्हें कटवाना जरूरी था
क्योंकि मच्छरों का खतरा बहुत है.
नींद बमुश्किल आती है पंखों के नीचे
पर नामुमकिन है घर के आगे पेड़ लगाना.
कौन समझेगा हमारी मजबूरियां
एक गराज का होना कितना जरूरी है.
कोलेस्ट्रोल से लड़ने के लिए टहलना जरूरी है
पर इतनी धूल में जाऊं तो दमा ले आऊँ.
पर क्या आसान है बिना कार के जीना
साईकिल और रिक्शा में वो आराम कहाँ.
सहूलियत कितनी महंगी पड़ रही हमको
धरती के जीव हैं पर यही नुक्सान करती है.
हाँ सच है कभी बन्दर हुआ करते थे हम
पर नोचा तो हमने इंसानियत के बाद ही इसे.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on May 20, 2009 at 9:20 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

about 2 years ago
भौतिक सुख समृद्धि की दुनिया में ऐसा ही होता है/ऐसा ही होगा ।
’अजहूँ चेत गँवार’ ।
about 2 years ago
यही विकास की कीमत है, जो हम चुका रहे हैं. फ्री में तो कुछ भी नहीं हासिल.
about 2 years ago
कौतूक भाई आपके कोरे विचार प्रभावित करते हैं। शुभकामना।
about 2 years ago
यही विकास मान लिया गया है और इसी विकास की कीमत हम चुका रहे हैं ..
सुंदर बात