एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
बोरियत
आज कल मैं बोर हूँ.
मतलब?
कंफ्यूज्ड, निरर्थक और अकर्मण्य भी हूँ.
यही बात कोई और मुझे कहे तो?
शायद एक गाली सा लगेगा.
पर यदि मैं नेता होता.
और कोई मुझे कुछ ऐसा कहता.
तो मुझे शायद ढूँढने होते कुछ इनसे भी भारी शब्द
जो छेद जाती एक आम इंसान के मन को
कर देती तार तार उसके मनोबल को
या लगा देती आग उसके तन बदन में
कुछ ऐसा कि वह भस्म हो जाता अपने ही क्रोध से.
क्या ऐसा कुछ होता यदि मैं सुन रहा होता ये सब
एक नेता की तरह?
शायद नहीं.
अभी हाल ही में तो सुनने को मिलते थे
ऐसे ही जलते हुए शब्द जो बता रहे थे हमें.
कि वे जो हमारे नायक हैं,
जो हमारे आदर्श हैं
जिनसे अपेक्षा है हमें एक शानदार नेतृत्व की
रखते हैं आधिपत्य इन शब्दों के भंडार पर.
पर नहीं होते थे शब्द उनके पास यह बताने को
कि कैसे करेंगे वे समाधान
भूख से बिलबिलाते बच्चों का
बाढ़ में बहते गांवों का
रास्ते में मरते मरीजों का
हस्पताल से गायब डाक्टरों का
स्कूल से गायब मास्टरों का
हमारी गली में जमा होने वाले पानी का
और रोज जाम होने वाली सड़कों का
कभी कभी दिखने वाली बिजली का
और भी बहुत कुछ
जिनकी फेहरिस्त लम्बी है
हमारे किस्मत में बदे दुखों की तरह.
और जब दौर ख़तम हो गया
गालियों, लांछनों और आरोपों का
और गफलत में ही सही
बना दी है हमने एक मजबूत सरकार
क्या अब वो पढ़ पायेगी हमारी फेहरिस्त.
बीस सालों से देख रहा हूँ अपने गाँव के हालात
बिजली आज भी नहीं दिखती एक सुन्दर पड़ोसन हो जैसे
और रास्ते आज भी दुरूह हैं गरीब की जिन्दगी की तरह.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on May 25, 2009 at 3:29 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |


about 2 years ago
“बीस सालों से देख रहा हूँ अपने गाँव के हालात
बिजली आज भी नहीं दिखती एक सुन्दर पड़ोसन हो जैसे
और रास्ते आज भी दुरूह हैं गरीब की जिन्दगी की तरह.”
एक उम्दा कविता….बधाई…
about 2 years ago
बीस सालों से देख रहा हूँ अपने गाँव के हालात
बिजली आज भी नहीं दिखती एक सुन्दर पड़ोसन हो जैसे
और रास्ते आज भी दुरूह हैं गरीब की जिन्दगी की तरह.
–सुन्दर पड़ोसन तो फिर भी मकान दुकान बदल लो तो मिल जाये मगर बिजली का टंटा अजब है.
बहुत सही बिम्ब खेंचे हैं, बधाई.