अपने आप ही छप जाता है जब
खटर-पटर करती उँगलियों से तुम्हारा नाम,
और मोबाइल पर नंबर लगते हुए जब ऑफिस से
डायल हो जाया करती है तुम्हारा ही नंबर,
तो सोचता हूँ जरूर मुझे तुमसे प्यार है.

कालेज के दिनों की बात होती तो शायद
दोस्तों को दिखाया करता तुम्हारा नाम,
उन्हें बताता हर वक़्त हो रही “प्रोग्रेस” को.
पर जब आता ख़याल, अरसा हुआ विवाह को
तो सोचता हूँ जरूर मुझे तुमसे प्यार है.

फिर याद आता है सुबह हुए झगड़े का.
विषय था, क्या चाय ऐसी बनती है
बहुत फीकी, बहुत मीठी या बहुत कड़वी?
पर जब अच्छा नहीं लगता बरिस्ता की कॉफी
तो सोचता हूँ जरूर मुझे तुमसे प्यार है.

कभी कभी अफ़सोस हुआ करता है
कि नहीं मिली तुम उन मस्ती के ज़माने में
नहीं तो होता बस तेरा ही नाम उन फसानों में.
फिर जब झेंप या डर नहीं लगता तुम्हे बताने में
तो सोचता हूँ जरूर मुझे तुमसे प्यार है.

और भी बहुत कुछ हैं जो तसल्ली देती है
कि रहेगा सफ़र के अंत तक तुम्हारा साथ,
हम तब भी चलेंगे डाल हाथों में हाथ.
जब रूह काँप जाती है तुम्हारे न होने के ख़याल से
तो सोचता हूँ जरूर मुझे तुमसे प्यार है.