एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
अश्लील
एक पुरुष का चॉकलेट बन जाना
एक लड़की का उसके नितम्ब का टुकडा खाना
कहलाता है अश्लील
उसी बदबू छुपाने वाली तरल के प्रचार में
जब गोते लगाती है एक स्त्री मन ही मन अभिसार में
तो वह नहीं कहलाता अश्लील
फिर लगाता है वही तरल एक पुरुष समंदर किनारे
लड़कियाँ अन्तरंग वस्त्रों में चली आती हैं दौड़े दौड़े
तो नहीं कहलाता अश्लील
स्त्री को निहारना इतना सहज है
कि हम विज्ञापन बनाते हैं सिर्फ उन्ही को देखने के लिए
हम सर हिलाते हैं जब वह पूछती है “छुओगे?”
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on May 27, 2009 at 2:37 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

about 2 years ago
Kya kaha jaay……
about 2 years ago
कौतुक जी,
बात गले तो उतरती है, कि एक स्त्री को देखने के लिये पुरुष अपने दंभ में वर्जनाओं के पार भी जाता है और ऐसा करने में शर्मिंदा भी नही होता, वहीं यदि ऐसी या थोड़ी मॉडरेट कल्पना कोई स्त्री करले तो बवाल मच जाता है।
चिंतनीय मुद्दा है।
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
about 2 years ago
aapki baat teek hai
yah kavita hai ya lekh
about 2 years ago
आपने बहुत अच्छी तरह एक बात कही
यही तो समाज है
about 2 years ago
भाई समकालीन कविता के इस युग मे “अकविता” के दौर मे क्यों जा रहे हो?
about 2 years ago
ufffffffff… it hurts!
about 2 years ago
naaree kee deh ko is tarah bhunaane men vyavsaayikataa haawi hai
or is bhayavah sach ko sab dekhanaa chahate hain..?
about 2 years ago
ये लडके आपस में क्या बाते करते हैं ?
वही, जो हम लोग किया करते हैं !
हाऽ हाय राम, ये कितने गँदे हैं ।
सत्यवचन महाराज, यह समाजशास्त्रियों द्वारा पैदा किया असँतुलन है !
कम से कम इस सदी में तो अभी बना रहेगा,
about 2 years ago
उड़ी बाबा इतनी अश्लीलता है इस आदमी नामक प्राणी में, बताने की कोई जरुरत नहीं थी, हमाम में सब नंगे हैं।
about 2 years ago
कौतुक जी, ये नंगई सन 91 के पहले तक भारत के प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया दोनों में नहीं हुआ करती थी। उदारीकरण के साथ विदेशी संस्कृति भी आई, जिसने नारी को सिर्फ उपभोग की वस्तु बना कर रख दिया । पहले वह मां, बहन, बेटी, बहू हुआ करती थी । अब वह सिर्फ इस्तमाल करने के लिए एक शरीर भर है । अफसोस यह है कि आज भारतीय नारी को अपने इस रूप से कोई परहेज भी नहीं है । अगर होता तो वह नारी शरीर के इस अशिष्ट चित्रण के खिलाफ आवाज उठाती, लेकिन आज वह खुशी-खुशी अश्लील विज्ञापनों के लिए माडल बनने को तैयार हो जाती है । क्या पैसा संस्कार, संस्कृति, नैतिकता आदि से भी ज्यादा कीमती होता है ? इसके साथ हम पुरूष भी इन सब के लिए बराबर के जिम्मेदार हैं ।
about 2 years ago
एक वितृष्णा भरी कविता.