एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
ऐना कियै छैक
भोर भेल,
ओ तैयार भेलाह.
दुपहरिया भेल,
ओ बिदा भेलाह.
सांझ भेल,
ओ पहुँच गेलाह.
राति भेल,
वो भेंट भेलाह.
भोर भेल,
ओ हेरा गेलाह.
सुनालियैक,
हमर बियाह भय गेल.
हमारा देखलक.
हमहूँ देखलियैक
अस्त-व्यस्त घर,
आओर ऐँठल लोक.
जेना तेना,
सामंजस भेल.
साउस रुस्लीह,
खिसिया गेलाह.
माये मुईल,
डपटि देलाह.
बेटा भेल
मुस्का देलाह.
बेटी भेल
खिसिया गेलाह.
नौकरी भेलन्हि,
हुनकर भाग.
गाय मुईल
हमर अभाग.
नहि बूझि सकल
की चाही हुनका.
हम चाहियन्हि
हमर बेटी नहि.
भोजन चाहियन्हि
बनौनिहार नहि.
सफाई चाहियन्हि
कयनिहार नहि.
घर चाहियन्हि
बसौनिहार नहि.
माए रहितैक
तऽ पूछितियैक.
की ओकरो
लागैत छलैक,
जीवन चाहियैक
मुदा एहन नहि?
सोचैत छी,
ओ रहिबो करितैक
तऽ की कहितैक
ओहो कहाँ भिन्न छल
हमर साउस सँ.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on May 29, 2009 at 9:07 am, and is filed under कवितायेँ, मैथिली. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |


about 2 years ago
kya baat hai!
majaa aa gaya aanchalik rango se sarabor is kavita ko padhkar.
aage bhi aisi rachnaaon kee prateekshaa rahegee.
about 2 years ago
की कहुं…निःशब्द भ गेलौं….
आर्श्चय भेल कि स्त्री के अंतरमनक व्यथा एगो पुरुष एते प्रभावी ढंग से केना कैह सकै छै. नतमस्तक अहांक कलम के आगाँ….
about 2 years ago
sunder
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Manpasand Gaane
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