अगर बंगलोर बिहार में होता
तो सड़क पर विचरने वाली गायों को देखकर
फिकरे कसे जाते “मंत्री जी हटिये”.
और गौड़ा के नित नए चोंचलों पर
बनता हंसी का पात्र एक पूरा राज्य
और वहां जन्म लेने वाले
तमाम अश्पृश्य और आभिजात्य.

पर यह तो बंगलोर है
जिस पर मीडिया की नजर
सिर्फ ऊपर की ओर जाती है
जब तक कि कोई बिलबिला कर
उनकी गर्दन मरोड़ कर
उनका सिर नीचे न झुका दे
या न करे जिद
उनके लटकते हुए कुरते को खींच-खींच कर
एक मचलते हुए बच्चे की तरह.

सड़क चलते कोई मर गया
खुले नाले में गिर कर.
पर वो उन्हें नहीं मालूम, जो रहते हैं
यहाँ से दूर
किसी गाँव में
और सुना करते हैं ताने
चलती ट्रेनों और बसों में
रामेश्वरम को जाते हुए.

लोग कितने अंधे से हो गए हैं,
या कहिये कि
वही पुरानी आदत
जिसकी वजह से आसान है
दूसरों की तरफ देख कर हँसना
ताकि अपने दर्द की याद कम आया करे.