एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
जो छूट गये अब हाथ से मेरे
कुछ दिनों से सोच रहा था
क्या क्या नहीं किया
कितने सालों से.
कि हल्के से यह दिल भींचा
आंख मली कि समझ ना ले कोई
कि वह कचरा नहीं था,
दो बूँदें थीं.
अब यह बूँदें यूँ ही आती हैं.
वैसे नही, जैसे आते थे
गिरने पर आंखों में सरसों के कीड़े.
अब नही दिखते
वो गन्ने वाले गाड़ीवान.
जो गाली तो दे देते थे
पर न रोकते हाथ हमारे.
चने नहीं उखाड़े कब से
जो उग आते थे
होली के मौसम में
रस्ते में स्कूल के मेरे.
नही सुनाई देती
अब उस माली की गाली
जो थक जाता था बस चार कदम पर
जब हम ढेले फेंका करते थे
कच्चे-पके आमों पर.
फेहरिस्त बड़ी लम्बी हो जायेगी
जो गिन लूँ उन चीजों को
जो छूट गये अब हाथ से मेरे
और हैं जो साथ अभी तक
उनकी सूची पोड़ों पर है.
नहीं नहीं उदास नहीं मैं
ये तो वे सुख के क्षण हैं
जो मुझको अह्सास कराती
जिया है सच में अपने बचपन को.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on June 22, 2009 at 2:23 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |


about 2 years ago
नहीं नहीं उदास नहीं मैं
ये तो वे सुख के क्षण हैं
जो मुझको अह्सास कराती
जिया है सच में अपने बचपन को.
–बहुत भावपूर्ण रचना.