कुछ दिनों से सोच रहा था
क्या क्या नहीं किया
कितने सालों से.
कि हल्के से यह दिल भींचा
आंख मली कि समझ ना ले कोई
कि वह कचरा नहीं था,
दो बूँदें थीं.

अब यह बूँदें यूँ ही आती हैं.
वैसे नही, जैसे आते थे
गिरने पर आंखों में सरसों के कीड़े.

अब नही दिखते
वो गन्ने वाले गाड़ीवान.
जो गाली तो दे देते थे
पर न रोकते हाथ हमारे.

चने नहीं उखाड़े कब से
जो उग आते थे
होली के मौसम में
रस्ते में स्कूल के मेरे.

नही सुनाई देती
अब उस माली की गाली
जो थक जाता था बस चार कदम पर
जब हम ढेले फेंका करते थे
कच्चे-पके आमों पर.

फेहरिस्त बड़ी लम्बी हो जायेगी
जो गिन लूँ उन चीजों को
जो छूट गये अब हाथ से मेरे
और हैं जो साथ अभी तक
उनकी सूची पोड़ों पर है.

नहीं नहीं उदास नहीं मैं
ये तो वे सुख के क्षण हैं
जो मुझको अह्सास कराती
जिया है सच में अपने बचपन को.