एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
आगन्तुकों से एक अपील
हे आगंतुक गण! तनिक सुनो!
चाँद के गिर्द तारों के समान,
समंदरी रेत पर पाँव के निशान,
शादी के कार्डों पर छपे हुए नाम,
बधाईयों वाले कार्डों के पैगाम,
मौके बेमौके भेजे हुए टेलीग्राम
जैसी ही होती हैं इन चिट्ठों पर
हमारी और आपकी टिप्पणियाँ.
इसीलिये, जब आये हो यहाँ तो
इन कहावतों को चरितार्थ करो,
अपने आगमन को यथार्थ करो.
मुझे व मुझ जैसे लेखकों को
अपने कीबोर्ड से कृतार्थ करो.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on June 23, 2009 at 3:13 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

about 2 years ago
कविता तो ठीक है, पर उपमा मुझे खटक रही है। सीढ़ी के कोनों पर थूकना और धरोहरों पर जोड़ों के नाम लिखकर उन्हें बदसूरत करना मुझे सबसा घटिया काम लगता है।
about 2 years ago
अरे हुजूर ..जब हाथों को कष्ट देंगे और की बोर्ड को भी तो निश्चित ही कुछ सुन्दर निकलेगा..अनुनाद जी की बातों से मैं भी सहमत हूँ..यार उपमा तो बढिया सी देते..मसलन चाँद जैसे मुखड़े पर तिल जैसे दाग बन जाओ…या की हमारी इस गली में खूबसूरत पडोसन की तरह दमक कर आ जाओ..
बहरहाल हम तो आ ही गए हैं..टीप भी दिया है..अब आगे आपकी मर्जी….
about 2 years ago
सहमत हूँ..
लोग थूका थाकी भी करते हैं…एनोनिमस गालियोँ को उस श्रिंखला मे ले लिया था.
इसे बदलता हूँ. आलोचना के लिये धन्यवाद.
about 2 years ago
लो जी कृतार्थ किया अब खुश?
about 2 years ago
लो जी दब गया की बोर्ड ….वैसे हम पिछला लेख पढने आये थे …
about 2 years ago
गजब, आपने बुलाया और हम चले आए।
about 2 years ago
likhane walo se aagrah hai ki kripaya kuchh naya likhen
about 2 years ago
तथास्तु !
about 2 years ago
Jo hukum.