हे आगंतुक गण! तनिक सुनो!
चाँद के गिर्द तारों के समान,
समंदरी रेत पर पाँव के निशान,
शादी के कार्डों पर छपे हुए नाम,
बधाईयों वाले कार्डों के पैगाम,
मौके बेमौके भेजे हुए टेलीग्राम
जैसी ही होती हैं इन चिट्ठों पर
हमारी और आपकी टिप्पणियाँ.
इसीलिये, जब आये हो यहाँ तो
इन कहावतों को चरितार्थ करो,
अपने आगमन को यथार्थ करो.
मुझे व मुझ जैसे लेखकों को
अपने कीबोर्ड से कृतार्थ करो.
अनुनाद सिंह
on Jun 23rd, 2009
@ 4:09 pm:
कविता तो ठीक है, पर उपमा मुझे खटक रही है। सीढ़ी के कोनों पर थूकना और धरोहरों पर जोड़ों के नाम लिखकर उन्हें बदसूरत करना मुझे सबसा घटिया काम लगता है।
अजय कुमार झा
on Jun 23rd, 2009
@ 4:22 pm:
अरे हुजूर ..जब हाथों को कष्ट देंगे और की बोर्ड को भी तो निश्चित ही कुछ सुन्दर निकलेगा..अनुनाद जी की बातों से मैं भी सहमत हूँ..यार उपमा तो बढिया सी देते..मसलन चाँद जैसे मुखड़े पर तिल जैसे दाग बन जाओ…या की हमारी इस गली में खूबसूरत पडोसन की तरह दमक कर आ जाओ..
बहरहाल हम तो आ ही गए हैं..टीप भी दिया है..अब आगे आपकी मर्जी….
कौतुक [Kaotuka]
on Jun 23rd, 2009
@ 4:48 pm:
सहमत हूँ..
लोग थूका थाकी भी करते हैं…एनोनिमस गालियोँ को उस श्रिंखला मे ले लिया था.
इसे बदलता हूँ. आलोचना के लिये धन्यवाद.
nirmla
on Jun 23rd, 2009
@ 5:00 pm:
लो जी कृतार्थ किया अब खुश?
Dr Anurag
on Jun 23rd, 2009
@ 7:21 pm:
लो जी दब गया की बोर्ड ….वैसे हम पिछला लेख पढने आये थे …
satyendra
on Jun 24th, 2009
@ 3:53 pm:
गजब, आपने बुलाया और हम चले आए।
jaya
on Jun 25th, 2009
@ 6:37 pm:
likhane walo se aagrah hai ki kripaya kuchh naya likhen
कौतुक [Kaotuka]
on Jun 25th, 2009
@ 6:57 pm:
Jo hukum.
Dr.Arvind Mishra
on Jun 26th, 2009
@ 7:20 am:
तथास्तु !
Cameron Smutnick
on Sep 6th, 2010
@ 12:13 pm:
The following steps demonstrate an easy system for.