एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
सपनो का फ्लैट
हम मध्यमवर्गीय थलचरों को
अवश्य चाहिए ईटों का घर
परन्तु जहाँ जीते हैं हम,
वहां न मिलती पब्लिक को घर
साकार करे जो सपना मेरा
मिलती है कुछ ऐसी दीवारें
जिनकी किस्तें भरने में ही
माथे पर उभर आए दरारें
यदि अगर कभी कुछ ऐसा होता
मुझ जैसों की विनती सुन कपीश्वर
ले जाते इन कम्पनियों को गाँव
मेरे सर भी होता अपने घर की छाँव
मारुती तो बिसरे थे कब के
अब तो बिसर गए अपने बंधू.
ख़ुद आते हैं साल पॉँच में घर
जो हर बार बढ़ा कर थोरा उदर.
अब जैसे तैसे मेरे जैसे लोग
लगें हैं लेने एक सपनो का फ्लैट
कि बच सके मासिक कटने वाले
में से थोड़ा इनकम टैक्स.
जो बचेगा टैक्स तो दे पाएंगे
बच्चों के स्कूल में कुछ दान
ताकि बना सके वह भी ख़ुद ही
हम जैसों की दुनिया में पहचान.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on February 20, 2009 at 8:07 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

