एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
क्योंकि ऐसे गिनकर थक जाओगे
एक लड़की पर तेज़ाब डाला गया.
दूसरी जींस पहन कर घूम रही थी.
तीसरी ने अपनी माँ की हत्या कर दी.
चौथी को ससुराल में जला दिया गया.
पाँचवीं को सेना मे भरती किया गया है.
छठी ने अपने पति को मार दिया.
सातवीं ने पति के साथ जान दे दी.
आठवीं मेरे साथ ही जी रही है.
नौवीं को लोग मेरी बेटी कहते है.
आप सोच रहें हो कब लिखेगा दस.
मेरा मन कहता है अब करो “बस”.
हमेशा बुलाओ उसे उसके नाम से.
और जब भी देखो चेहरे के उसके,
तो न झांको उसकी टाँगों के बीच.
ताकि बचा सको अपने दिमाग को
ठीक उसी तरह दो फाँक होने से.
क्योंकि ऐसे गिनकर थक जाओगे.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on June 25, 2009 at 6:56 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |


about 2 years ago
सही कहा आपने,
आज तो कितने ही रूप धारण कर रही है,
ये आधुनिक बालाएँ, धन्यवाद
about 2 years ago
बहुत बडी बात करती छोटी सी कविता…
about 2 years ago
बस केवल नौ बेटी ऐसी तो नोसौं होंगी तो भी कम है।
about 2 years ago
bahut acchha hai
about 2 years ago
Hi,
As per our today’s technological lifestyle,we all forget this type of creation in our life.
Above its really very interesting also.
Thank You Very Much!!