एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
वह कविता कैसे बनाऊँ मैं
लगे आपको “अप्रतिम”
वह शब्द कहाँ से लाऊँ मैं.
स्वरचित अज्ञान शिविर में
जब तड़प रहा हूँ हर दिन मैं.
अतुल्य लगे जो पाठक को
और जलाये दीप तिमिर में
वह कविता कैसे बनाऊँ मैं.
शब्द नहीं हैं पास मेरे
भाव गये कब के संग छोड़.
लिखना नहीं चाहता हूँ मैं
पर जब दबते हाथों के पोड़.
बह जाती मसि की इक धार
फिर बिखरते शब्द चहुँ ओर.
लोग कहें कि कविता हो गयी
शर्म से देखूँ मैं तब मुँह मोड़.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on June 29, 2009 at 8:57 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |


about 2 years ago
Behad sundar kavita hai kautuk ji. Kuchh nahi karke bahut kuchh kar diya.
about 2 years ago
बहुत गहन!!