एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
मानसून हो कि बज़ट
कितना अच्छा होगा जब
एक ही किताब पढ़ायी जायेगी
दिल्ली से सुदूर गाँव तक.
बिजली का क्या है
दिल्ली में भी कायम नही रहती.
रास्ते में गड्ढे के लिये भी
जरूरी नहीं है किसी गाँव मे होना.
हस्पताल के दरवाजे पर मरने के लिये
कहीं और जाने की जरूरत नहीं.
राख़ आँखों मे उड़ कर गिरे
उसके लिये जरूरी है
कि हवा करो.
या फिर मारो पैर
राख से ढंके आग के ढेर में.
पर कहाँ.
हमें तो आदत हो गयी है
भींगे भींगे से रहने की.
कब फ़र्क पड़ता है
मानसून आया कि नहीं.
या बजट बनायी जाये
सिर्फ़ पूँजीपतियों और वोटों के लिये.
गोया मानसून हो कि बज़ट
घर और सपने तो टूटेंगे ही.
खैर, आप अख़बार पढ़िये
और चलिये, करते हैं
कुछ उम्दा किस्म की बहस.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on June 30, 2009 at 5:52 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |


about 2 years ago
कौतुक जी,
बहुत ही गहरे विषाद से यथार्थ का चित्रण करती है :-
पर कहाँ.
हमें तो आदत हो गयी है
भींगे भींगे से रहने की.
कब फ़र्क पड़ता है
मानसून आया कि नहीं.
या बजट बनायी जाये
सिर्फ़ पूँजीपतियों और वोटों के लिये.
गोया मानसून हो कि बज़ट
घर और सपने तो टूटेंगे ही.
खैर, आप अख़बार पढ़िये
और चलिये, करते हैं
कुछ उम्दा किस्म की बहस
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
about 2 years ago
ओर भी कई इशू है बहस के
माइकल जेक्सन की मौत
वेस्टइंडीज में हार ओर
समलैंगिको की रैली
लालगढ़ का क्या है
दो चार दिनों में
कब्जे में आ जायेगा
लाईट तो नहीं आएगी हमारे यहाँ
कहते है कर्ज है बहुत
कल सुना की पार्को में लगे कई करोड़
खैर हमारा क्या है
हमें तो आदत है यूँ ही भीगने की…….
about 2 years ago
बहस क्या करें-सिब्बल जी दिवा स्वपन दिखा रहें हैं..बाकी सब उन्हें ताकते आँख मिचमिचा रहें हैं.
इसी मिचमिचाहट और दिवा सपनों को पिछले ६२ वर्षों में हमने नाम दे दिया है – जिन्दगी -विवशता भी परिभाषित हो ही जाती है.
एक उम्दा रचना जो ऐसे विचारों को जन्म दे जाये. बधाई और आभार.
about 2 years ago
गोया मानसून हो कि बज़ट
घर और सपने तो टूटेंगे ही…
चर्चे तो बहोत होंगे पर हम रहेंगे मौन.
जबतक प्यास बुझेगी मुद्दे हो जायेंगे गौण.
मुद्दे हो जायेंगे गौण बज़ट के विश्लेषण में
पांच साल यूँ ही बीतेंगे सुरक्षा के अन्वेषण में .
about 2 years ago
उम्दा किस्म की रचना.
about 2 years ago
nice
about 2 years ago
बिजली का क्या है
दिल्ली में भी कायम नही रहती.
रास्ते में गड्ढे के लिये भी
जरूरी नहीं है किसी गाँव मे होना.
हस्पताल के दरवाजे पर मरने के लिये
कहीं और जाने की जरूरत नहीं.
behtareen,
nunga kar diya apne Vyavastha ko.
Badhai. Jai ho.
about 2 years ago
Hi,
Find lots of best creation and a speically in Hindi,Like all most all.
Here its really nice work done!!
Best of Luck!!
about 2 years ago
बेहतरीन!
about 2 years ago
बहुत बहुत धन्यवाद.
इसी को कहता हूँ मैं “डॉ० अनुराग होना”.