एक गाँव में एक किसान रहता था. उसके तीन बेटे थे. तीनो में कोई काम नहीं करता था. सब के सब मुफ्त की रोटी तोड़ने में यकीन रखते थे. यह देख कर बेचारा बहुत परेशान रहता था. आखिर एक दिन आ ही गया जब उसकी उम्र और चिंताएँ उसके स्वास्थ्य से जीत गयी और वह बीमार रहने लगा. किसान के पास ढ़ेर सारी जमीन पड़ी थी पर उसका कोई भी बेटा जोतने को राजी न था, सब उसकी दिनानुदिन की कमाई और बचाई हुई जमा पूंजी खर्च किये जा रहे थे.

एक दिन किसान को लगा कि वह अब ज्यादा दिन नहीं जी पायेगा. सोचा, पता नहीं कब मर जाऊं इन मुफ़्त्खोरों को रास्ते पर लाना जरूरी है. उसने अपने तीनो बेटों को संदेशा भिजवा दिया कि जल्द से जल्द मिलो. जब बेटों को संदेश मिला उस वक़्त वे किसी दावत में व्यस्त थे. उन्होंने आपस में मंत्रणा की कि बाबूजी की हालत सुबह तक तो ठीक थी और संदेश देने वाला भी घबराया हुआ नहीं था तो जरूर अभी भी ठीक ही होगी. बीमार हैं, हो सकता है संपत्ति के बंटवारे की सोच रहे हों. उसके लिये हमें चिन्ता करने की अवश्यक्ता नहीं, हमारे बीच इतनी समझ तो है ही. बेहतर होगा उनसे शाम को लौटने पर मिला जाय.

तीनो बेटे आधी रात को घर पहुंचे, दावत करके बुरी तरह थके हुए थे, फिर भी आपस में बात कर के निर्णय लिया कि पिता जी से पांच मिनट बैठ कर बात करने में कोई हर्ज नहीं है, अगर बात लम्बी हुई तो सुबह को टाल देंगे.

किसान अपने तीनों बेटों के इंतजार में अभी तक जाग रहा था. वे तीनों पहुंचे, और पिता से पूछा कि उन्हें क्यों याद किया. किसान ने तीनों को बैठने को कहा और कहा कि बारी बारी से तुम लोग मुझे बताओ कि मेरे बाद तुम अपना जीवन यापन किस तरह करने वाले हो.

तीनो ने एक स्वर में कहा “पिताजी, फिर वही बात. हम जैसे भी होगा अपना काम चला लेंगे, आप चिंता मत कीजिये”.

किसान ने कहा “देखो मैं अपने जीते जी तुम लोगों को भोजन, वस्त्र और आवास का अभाव नहीं होने दिया है, मैं इस इत्मीनान से मरना चाहता हूँ कि मेरे बाद भी तुम लोग इन मूलभूत आवश्यकताओं के लिए नहीं भटकोगे, साथ ही समाज में जिस तरह सम्मान के साथ जिए हो वैसे ही जी पाओगे. कभी किसी के लिए हाथ तो न फैलाओगे”.

बेटों ने फिर कहा “पिता जी यूँ तो इस विषय पर बात करने की जरूरत ही नहीं है, पर आप चाहते हैं तो हम सुबह बात करेंगे, हम बहुत थके हुए हैं”.

किसान ने एक न चलते देख कहा “ठीक है हम सुबह ही बात करेंगे”.

रात देर से सोने की वजह से सुबह उन्हें उठने में देर हुआ, दिन चढ़ चुका था और किसान बेसब्री से उनकी प्रतीक्षा कर रहा था. करीब १2 बजे तैयार हो कर वे पिता के पास पहुंचे.

किसान ने उनके आते ही कहा, तुमने पहले ही बहुत देर कर दी है मेरी तबियत भी ठीक नहीं और बैंक भी जाना है, डॉक्टर को भी दिखाना है. तुम में से कोई मेरे साथ चलता तो अच्छा रहता.

बीच में ही छोटे बेटे ने टोका, पिताजी तबियत आपकी ख़राब है डॉक्टर तो आप ही को देखेगा, वहां जा कर हम क्या करेंगे. रही बैंक की बात वह हमारे जाने से तो होने वाला है नहीं. वैसे आपके साथ ड्राइवर तो है ही. हाँ बैंक से याद आया कुछ पैसे मुझे भी चाहिए. किसान ने पूछा, और जो दो दिन पहले पैसे लिए थे वो ख़त्म हो गए? उसने कोई जवाब न दिया पर मुंह लटका लिया. किसान को गुस्सा भी आया पर उसका मुंह देख कर चुप रह गया.

किसान ने कहा, देखो अब मैं बूढा हो चुका हूँ, पता नहीं कब जाना पड़े. मैं नहीं चाहता कि मेरी मृत्यु के बाद तुम यहाँ वहां भटको. भगवान की कृपा से हमारे पास अच्छी-खासी जमीन है और खेती के सारे उपकरण हैं. बाहर से मजदूर भी आ ही जाते हैं. बस अगर तुम तीनों मिल कर इसे मैनेज करना सीख लो तो बहुत है. तुम्हे किसी चीज की कमी नहीं रहेगी.

बड़े बेटे ने कहना शुरू किया, आप चिंता न करें. हमने भी सोचा है कि हमारे पास जो जमीन है हम उसे लीज पर कारखाने को दे देंगे, जिससे होने वाली आमदनी हमारे रोजमर्रे की जरूरत के लिए काफी होंगे. उसके अलावा घर में जो जेवर वगैरह हैं उनकी हमें जरूरत नहीं. माँ के बाद वैसे भी वे बेकार पड़े हैं और आज की लड़कियों को इनमें इन्टेरेस्ट नहीं होता. आपके इंश्योरेंस का पैसा हमारे बुरे वक्त के लिये रख लेंगे. घर के आधे हिस्से को हमनें एक होटल में तब्दील करने का सोचा है. खेतों को जोहने के लिये जो घर है उसे हम एक शराब के ठेके वाले को दे देंगे. मुझे नही लगता कि इससे ज्यादा चिन्ता करने की जरूरत है.

किसान निरुत्तर था.

पुरखों की जमीन जायदाद का इससे ज्यादा अपमान तो हो ही नहीं सकता फिर क्या किया जाय ऐसा सोचते हुए किसान उसी शाम मर गया.