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अपील
Apr 5th
मुझे प्यार न करो तुम, तो भी गम नहीं.
बस अपने दिल में नफरत न बसा लेना.
रह लेंगे घरों के दरवाजे बंद कर के हम,
रहे ताकीद कभी भीड़ में मुंह न फिरा लेना.
यह चमन है तुम्हारा भी मानो या न मानो.
गफलत में कभी घर में दुश्मन न घुसा लेना.
और कहें क्या तुम से कितनी है उम्मीद,
घर छोड़ तू मुझे अपने दिल में भी जगह देना.
सोया रहे भगवान तो गम नहीं दोस्त,
मुझे डर है तू शैतान न जगा लेना.
हार जाए मनपसंद पात्र तो कोई गम नहीं,
रहे ख्याल तुम्हे भी कि कुपात्र न जीता देना.
तिजारत तुम्हारे सपनों का करते हैं जो,
भूले से भी तुम उन्हें दिल में न जगह देना.
नहीं काम आयेंगे तुम्हारे ये मौकापरस्त कभी,
किसी उसूलोईमान वाले को दिल से लगा लेना.

आगन्तुकों से एक अपील
Jun 23rd
Posted by दरभंगिया in कवितायेँ
9 comments
हे आगंतुक गण! तनिक सुनो!
चाँद के गिर्द तारों के समान,
समंदरी रेत पर पाँव के निशान,
शादी के कार्डों पर छपे हुए नाम,
बधाईयों वाले कार्डों के पैगाम,
मौके बेमौके भेजे हुए टेलीग्राम
जैसी ही होती हैं इन चिट्ठों पर
हमारी और आपकी टिप्पणियाँ.
इसीलिये, जब आये हो यहाँ तो
इन कहावतों को चरितार्थ करो,
अपने आगमन को यथार्थ करो.
मुझे व मुझ जैसे लेखकों को
अपने कीबोर्ड से कृतार्थ करो.