एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
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मेरा भारत महान?
Apr 16th
मेरा बाप मर गया
उस के नाम पर दे दो भाई
उसकी माँ भी मर गयी साहब
उस के नाम पर तो दे दो भाई
मेरे बाप का नाना बड़ा सयाना
उसके नाम पर तो दे दो भाई
अल्लाह के नाम पर दे दो भाई
राम के नाम पर दे दो भाई
ईशा के नाम पर ही दे दे भाई
वाहे गुरु दा खालसा, वाहे गुरु दी फतह
अब तो तुम दे दो भाई.
भिखारी लोग घबरा गए,
इधर उधर भागने लगे,
चिल्लाने लगे, चारो तरफ चिल्ल-पों .
फिर एक आवाज आयी
ये तो हमारे नारे थे
तुम अपनी वाली लगाओ ना.
पब्लिक खड़ी सोचती रही
ये अपने नाम पर कब मांगेंगे.
पुलिस भी खड़ी सोचती रही
इनके आगे-पीछे हम क्यूँ भागेंगे.
जनता परेशान और हलकान
वोट दे कर छुड़ाई जान.
नेपथ्य से आवाज आयी
कब तक दिलासा दोगे खुद को
कह के “मेरा भारत महान” ?
कल चुनाव है
Apr 16th
है आज मुझे नहीं, कुछ सूझ रहा.
और ना ही यह मन, कुछ बूझ रहा.
मुझको है चुनना, मेरा नेता, पर हा!
चाल-चलन उनका, अब भी अनबूझ रहा.
कब तक यूँ अन्धकार में
देगा शब्दभेदी वोट तू.
खोले आँखें, देख बाहर
है कितना प्रकाश पड़ा.
हम वोट क्यों दें?
Apr 15th
एक बार नजर दौड़ाईए देश के उन व्यक्तियों पर जो संभावित रूप से प्रधानमंत्री बन सकते हैं और फिर बताईये कि आपको यह नहीं लगता कि आप से कहा जा रहा है कि “इन बेशर्मों और बेगैरतों में से एक को अपना प्रधानमंत्री चुन लो”.
आप कहेंगे कि इन पार्टियों को वोट ना देकर किसी निर्दलीय या किसी तीसरी चौथी पार्टी के उमीदवार को वोट दीजिये.
तो? हल मिल गया?
वैसा उम्मीदवार अमूमन तो मिलेगा नहीं और मिल गया तो जीतेगा नहीं. चलिए मान लिया कि उसकी किस्मत जीतने की है और वह जीत गया. फिर वह क्या करेगा? किसी एक बेगैरत इंसान के साथ चिपक जायेगा. फिर पांच साल हम भकुआ की तरह उनका मुंह देखें और अपना सर धुनें. यही हमारी नियति है?
नहीं यह हमारी नियति नहीं है. यह हमारे सामुदायिक दायित्व से मुंह फेरने का नतीजा है. ऐसा इसलिए हो रहा है कि हम राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहते. हम उसके दर्शक हैं जो दूर खड़े तमाशा देखते हैं. फिर सिर धुनते हैं कि तमाशा ठीक नहीं हो रहा. फिर खुद करो ना तमाशा, किस ने रोका है? उठो स्वयं और खड़े हो जाओ मंच पर. डरते क्यों हो? तुम जैसे हजारों जब तक नहीं आते, और उनमे से उन्नत निकल कर वृहद् अकार नहीं लेते, तमाशा तो ऐसा ही होता रहेगा. अब तुम्हारे पास दो रास्ते हैं. एक कि स्वयं तमाशाई बन कर खड़े हो जाओ या फिर अच्छे तमाशबीन बन कर वोट करो. फिर तुम्हारे हाथ में होगा कि तुम किस का तमाशा देखना चाहते हो. कौन सबसे बेहतर है.
सबसे बेहतर का अर्थ यह नहीं कि पूरे देश में कौन सबसे बेहतर है. तुम्हे उन्ही में से चुनना होगा जो अपना सब कुछ छोड़ (यदि छोडा हो तो) कर तमाशा दिखाने आये हैं. अब उन में से कुछ लालच में आये हों और कुछ सुच्चा कलाकार हों, यह वाजिब है. और तुम्हे इस तमाशे में हर बार शामिल होना होगा. चयन इमानदारी से करते रहो. घटिया कलाकार तो स्वयं खेल से बाहर हो जायेंगे.
नहीं मानते तो संगीत को लीजिये, सिनेमा को लीजिये. आप ख़राब कलाकारों को धीरे धीरे निकालते जाते हैं और बच जाते हैं आपके पास घिस कर निकले हुए चमकते सितारे. ठीक उसी तरह नेता भी एक दिन में नहीं बनता. आपकी पसंद को भी घिसना होगा, उसे भी कई परीक्षाओं में पास होना होगा. और वह परीक्षा आप लेते हैं. आपके विचार से ही वह उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण होता है. और जो बार बार उतीर्ण होता आया वही सबसे आगे की कतार में खडा है. उसे भी बार बार उतीर्ण कर के वहां तक भेजा आया है जहाँ से वह आपको साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा है. अब यदि वह, जो दूर खडा सबसे ऊपर दिख रहा है, आपको पसंद नहीं है, तो जो पसंद है उसे आगे बढाईये.
इसीलिए वोट दो.
नेता, भ्रष्ट, घमंडी, मतलबी, चोर, निर्लज्ज वगैरह वगैरह
Apr 6th
जिसको दिल में आया ब्लॉग लिखा, जिसके मुंह में आया किसी नुक्कर पर खड़े हो गए और हजारों गालियाँ नेताओं को दे दी. नेता, भ्रष्ट, घमंडी, मतलबी, चोर, निर्लज्ज वगैरह वगैरह.
मैं यह सोच कर गलती नहीं कर रहा कि हमें और नेताओं की जरूरत है. और नेता का मतलब तो यह भी नहीं होता होगा कि सब के सब सीधे दिल्ली पहुँच जाएँ. तो मैं यह मान कर चलता हूँ कि जरूरत है. हमें ऐसे नेता चाहियें जो हमारी समस्याओं को समझते हों और जिन तक हमारी बात सीधे-सीधे पहुँच सके. तो मैं उन नेताओं को निचले स्तर पर गलियों, मुहल्लों, गाँवों के स्तर पर नेता बनाना चाहूँगा.
मुझे मालूम है कि मैं कोई नई बात नहीं कर रहा. पर पुरानी बात को क्या हो गया है? हमने जो कडियाँ जोड़ रक्खीं थी उसे क्यों तोड़ दिया? हमें बिलकुल जमीनी तौर पर काम करने वाली पार्टियों के नेता सबसे निचले स्तर पर चाहियें जो निज स्वार्थ के लिए, या सिर्फ अपने घर और कार के ऊपर हरा, नीला, लाल, गेरुआ झंडा न लगते हों. जिन्हें यह भी नहीं लगता हो कि वे मोहल्ले के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बनते जा रहे हैं. जो इस बात का ख्याल रख सके कि किस चीज की जरूरत है. ऊपर कही हुई सारी बातें मैं ने होती हुए देखा है.
पर ऐसे नेता हम लायेंगे के कहाँ से? जिसको भी गली का नेता बनाने का मौका मिला वही शेर हो जायेगा. मेरा ख्याल है चुनाव समाज के सबसे छोटे छोटे निवासीय टुकड़े से शुरू होनी चाहिए.
मेरा विचार है कि ऐसे चुनाव हर गली-मोहल्ले में हों, जिसमे उस स्थान का प्रतिनिधि सालाना चुना जाये, और वह अपने से ऊपर के स्तर के नेता, अधिकारी वगैरह से सीधा मिले. यह अधिकार उनको स्वयं मिलने लगेगा जब नेताओं और अधिकारीयों को यह पता चलेगा कि इस व्यक्ति की बात पर जनता उनसे मुंह फेर सकती है.
अब इनमे भी भ्रष्टाचार जैसे अवगुण की संभावनाएं हैं. उसका निदान यह है कि इन नेताओं के ऊपर के नेता और अधिकारीगण भी लोगों के सीधे पहुँच में हों और इनका सालाना चुनाव होना चाहिए और यह कार्य मोहल्लेवासियों द्वारा स्वयं किया जा सकता है. साथ ही लोगों को भी यह भी अधिकार हो कि साल के बीच में ही जरूरत समझने पर बहुमत से उसे बदल सकें.
मतलब अभी आप अपने नेता को जानते हो और उसके ऊपर के नेता को भी. जैसे कि गली का नेता फिर वर्ड कमिश्नर स्तर का नेता या मुखिया. इस से यह होगा कि संवाद में हेर फेर के मौके कम हो जायेंगे. आपने कोई शिकायत या सुझाव दिया पर वह आपके नेता ने ऊपर के नेता तक नहीं पहुंचाई. ऐसी हालत में जब आपका संवाद उसके ऊपर के नेता से होगा तो आपको पता चल जायेगा कि आपका नेता ठीक काम नहीं कर रहा.
और ऐसी व्यवस्था हर स्तर पर होनी चाहिए. आपकी गली के नेता का भी वार्ड कमिश्नर और मुखिया के ऊपर के नेता तक पहुँच होनी चाहिए. तभी पारदर्शिता और जिम्मेदारी का भाव आयेगा और सबको इस बात का दर रहेगा कि उसकी कामचोरी या कोताही उसका नुक्सान तो अवश्य करेगी.
जब हमारा देश ऐसे नेताओं से भरा होगा तभी हमारी बात ऊपर तक पहुंचेगी. यदि किसी पेड़ के पत्ते चमकदार और सुन्दर हैं तो इसका मतलब है उसकी जड़ जमीन के बहुत नीचे से पूरे तंत्र को ऊर्जा प्रसारित कर रही है. फिर देखेंगे कि इनमे से कुछ ऐसे नेता होंगे जो उभर कर ऊपर आएंगे और जमीन से जुड़े अनुभव के साथ देश चलाने का काम कर सकेंगे.
फिर आप न कह सकोगे नेता, भ्रष्ट, घमंडी, मतलबी, चोर, निर्लज्ज वगैरह वगैरह.
कृपया अपने विचार व्यक्त करें ताकि जरूरी संशोधन भी किया जा सके.
अपील
Apr 5th
मुझे प्यार न करो तुम, तो भी गम नहीं.
बस अपने दिल में नफरत न बसा लेना.
रह लेंगे घरों के दरवाजे बंद कर के हम,
रहे ताकीद कभी भीड़ में मुंह न फिरा लेना.
यह चमन है तुम्हारा भी मानो या न मानो.
गफलत में कभी घर में दुश्मन न घुसा लेना.
और कहें क्या तुम से कितनी है उम्मीद,
घर छोड़ तू मुझे अपने दिल में भी जगह देना.
सोया रहे भगवान तो गम नहीं दोस्त,
मुझे डर है तू शैतान न जगा लेना.
हार जाए मनपसंद पात्र तो कोई गम नहीं,
रहे ख्याल तुम्हे भी कि कुपात्र न जीता देना.
तिजारत तुम्हारे सपनों का करते हैं जो,
भूले से भी तुम उन्हें दिल में न जगह देना.
नहीं काम आयेंगे तुम्हारे ये मौकापरस्त कभी,
किसी उसूलोईमान वाले को दिल से लगा लेना.

आपने कहा