एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
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यह मौसम भी चला जायेगा
Apr 3rd
मेढकों के टर्राने के दिन हैं.
सियारों के गाँव आने के दिन हैं.
जो कभी दिखते भी नहीं,
उनके हाथ जोड़ सर झुकाने के दिन हैं.
यही एक दिन तो हम आम इंसानों के दिन हैं.
यह मौसम भी चला जायेगा
अपने साथ मेढकों और सियारों को ले कर.
और हम यहीं होंगे अपने दालानों पर
उनके दिए कम्बल और धोती लपेटे हुए.
और खबर आयेगी “फलां बिन इलाज मर गया”.
कल ही की तो बात है
दुक्खन नाचता था सड़कों पर
ताड़ी पी कर पहले पहल बाप बनने की खुशी में.
ताड़ी तो आज भी पीता है सुबहो शाम,
पर उस के नाम जो हस्पताल के रास्ते में मर गयी
उसके दालान पर खांसता उसका बूढा बाप
कोसता है उसको वही कम्बल ओढ़े हुए.
जो नेताजी दे गए थे अपने हाथों से
और कह गए थे, बाबा तुम्हारा ही बेटा हूँ मैं भी.
वह मासूम चेहरा भरा खुशहाली का इश्तहार
आज भी चिपका है मिट्टी के दीवार से.
इतनी मासूमियत हो जिनके दिलों में
वे दुःख को क्यूँ कर समझने लगे.
मदारी-2
Apr 2nd
मदारी: जमूरे!
जमूरा: हाँ उस्ताद.
मदारी: खेल दिखायेगा?
जमूरा: सच्चा की झूठा?
मदारी: झूठा तो बहुत देखा पब्लिक ने. अब सच्चा दिखा.
जमूरा: फिर तो फरमाईशी कार्यक्रम होगा. बोल उस्ताद क्या दिखाऊँ?
उस्ताद, इलेक्शन का टाइम है, कुछ उसी पर दिखा.
जमूरा: उस्ताद, इलेक्शन का नाम मत लो (..और रोने लगता है).
मदारी: अब्बे, क्या हो गया? बाप मर गया या माँ भाग गयी?
जमूरा: बाप तो तू ही है और तेरी बीवी भागे तो मेरे ठेंगे से.
मदारी: तो क्या हुआ?
जमूरा: मैं इलेक्शन में खडा होने वाला था पर अब नहीं.
मदारी: बाप से मजाक करता है?
जमूरा: नहीं उस्ताद, सच कह रहा हूँ. मैं इलेक्शन में खडा होने वाला था.
मदारी: चल मान लेता हूँ, फिर क्या हुआ?
जमूरा: मैंने पब्लिक को बोला मैं हिन्दू हूँ, पब्लिक की बहन ने अन्दर कर दिया.
मदारी: ये तो बुरा हुआ. चल जाने दे. खेल दिखा.
जमूरा: अब तो मैं जेल में हूँ. (कह कर भाग खड़ा होता है).
चुनाव
Mar 3rd
लोकतंत्र का महापर्व कहलाता है यह चुनाव
और नेतागिरी का अखाडा भी कहलाता है चुनाव
हमें अपने अधिकार भी याद दिलाता है चुनाव
पुरातन पार्टी या उसी के टुकड़े ही ढूंढ लाता है चुनाव
रात जैसे कटेगी कभी नहीं, ऐसे ख्वाब दिखता है चुनाव
हर बार अलग मिठाई की तस्वीरें दिखता है चुनाव
बासी मिठाई की भी स्वाद मुँह में लाता है चुनाव
पिछले बार के वादे भी याद हमें दिलाता है चुनाव
चेहरे बदल बदल कर एक ही नेता लाता है चुनाव
शिकायतों और लांछनों के बंडल भी खुलवाता है चुनाव
देशी शराब के ठेके भी कहीं कहीं मुफ्त चलवाता है चुनाव
और नतीजे भी हर बार एक ही लाता है चुनाव
जैसे बहनों बेटियों के लिए करते हो दूल्हे का चुनाव
वैसे ही किया करो अपने क्षेत्र के नेता का चुनाव
दुरुस्त करनी हो चीजों को, तो करो ठीक तुम अपना चुनाव
या फिर ना कहो कि क्या हमें दिलवाता है यह चुनाव

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