कितना अच्छा होगा जब
एक ही किताब पढ़ायी जायेगी
दिल्ली से सुदूर गाँव तक.
बिजली का क्या है
दिल्ली में भी कायम नही रहती.
रास्ते में गड्ढे के लिये भी
जरूरी नहीं है किसी गाँव मे होना.
हस्पताल के दरवाजे पर मरने के लिये
कहीं और जाने की जरूरत नहीं.

राख़ आँखों मे उड़ कर गिरे
उसके लिये जरूरी है
कि हवा करो.
या फिर मारो पैर
राख से ढंके आग के ढेर में.

पर कहाँ.
हमें तो आदत हो गयी है
भींगे भींगे से रहने की.
कब फ़र्क पड़ता है
मानसून आया कि नहीं.
या बजट बनायी जाये
सिर्फ़ पूँजीपतियों और वोटों के लिये.
गोया मानसून हो कि बज़ट
घर और सपने तो टूटेंगे ही.
खैर, आप अख़बार पढ़िये
और चलिये, करते हैं
कुछ उम्दा किस्म की बहस.