एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
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मेरी पीं पीं करने वाली गुड़िया
Apr 21st
बिटिया बड़ी हो रही है.
अब वो पीं पीं करने वाले खिलौनों से नहीं खेलती.
अब उसे चाहिए नए कपडे, गहने और गुडिया.
कल ही की बात है कि हथेलियों में समा जाती थी.
शायद कल गोद में भी न समायेगी.
रह जायेगी यही यादें मेरे साथ.
जब कभी दूर वो चली जायेगी.
उन्ही यादों का एक कतरा
रख लेता हूँ सजों कर अपने पत्र में.
अच्छा है अब पत्र बोल सकते हैं.
वरना कहाँ वापस आएगा ये मेरा बचपन.
घी कहाँ गिरी तो दाल में
Apr 5th
दफ्तर में मैं और मेरे कुछ साथी जिनकी शादी नहीं हुई है उनको खींचते रहते हैं या यूँ कहिये कि चने की झाड़ पर चढ़ाते रहते हैं. यह एक ऐसी उम्र होती है जब हर लड़के लड़कियों को शादी के नाम पर एक अजीब सी गुदगुदी होती है. अब इस बात से यदि आप इनकार करते हैं तो मैं साफ़ साफ़ बता दूं कि जिनको ऐसी गुदगुदी नहीं होती हम उनकी बात ही नहीं कर रहे. अब ऐसे ही एक ताजा-तरीन वाकया पर नजर डालें.
कुछ ही दिनों पहले हमारे एक सहकर्मी अपनी छोटी बहन की शादी करवा कर लौटे हैं. वे कुंवारे हैं और हंसमुख भी. उनसे हमारी अच्छी बंटी हैं वजह वही है कि वे नए ज़माने के शब्दों में कहें तो पक्का “स्पोर्ट” हैं. एक आदर्श भाई होने के नाते वे और उनके अग्रज दोनों ने ही अभी तक विवाह नहीं किया है. वैसे उन दोनों की उम्र आज के ज़माने के हिसाब से ज्यादा नहीं हुई है. अभी वे अपने २० के खाने में ही हैं.
खैर तो मैं बता रहा था कि – हम उन्हें खींच रहे थे कि आपने अपनी बहन की शादी में जो लड़की पसंद की उसका क्या हुआ? यह किस्सा वो जब से आये हैं तब से चल रहा है और आखिर आज उन्होंने राज खोल ही दिया. कहानी कुछ ऐसी है..उन्ही की जुबानी. अरे हाँ एक बात बता दूं कि मेरे यह मित्र “मस्त” शब्द का मस्त प्रयोग करते हैं.
शादी के दिन लोगों के स्वागत का मस्त काम चल रहा था कि तभी एक चाचा आये और एक ओर थोरी दूर की तरफ इशारा कर के कहा “वहां गुलाबी कपडों वाली लड़की को देख रहे हो ना, उसके बारे में अपनी राय बताओ” और कहीं चले गए. अब मैं तो मस्ती में खुश की चाचा जी ने हरी झंडी दिखा कर गुलाबी इंजन दिखा दी है तो मुझे तो मस्त चलना चाहिए पहली बोगी बन के. पर बड़ी प्रॉब्लम हो गयी.
जब लड़की देखने के लिए उस तरफ गया तो देखा कि वहां दो लड़कियां गुलाबी कपडों में एक ही साथ थी. मैंने इधर उधर देखा पर चाचा जी नजर नहीं आये. गौर से देखा तो उसमे एक तो बहुत मस्त थी, बोले तो एकदम मस्त. मैं भी यह सोच कर कि इसमें एक तो है ही तो क्यों न दोनों का ख्याल रखूँ, उनका ख्याल रखने लगा (अपने यहाँ इसको ‘चारा डालना’ कहते हैं).
अगले चार पांच घंटे में शादी हो गयी. फिर सबके जाने के समय में चाचा जी नजर आये और पूछा “कैसी लगी वह लड़की”? मैंने पहले पूछा कि वहां तो दो गुलाबी कपडों वाली लड़की थी उसमे से कौन सा वाला देखने को बोला था? जब उन्होंने डिटेल में बताया तो पता चला कि वे उसी मस्त लड़की की बात कर रहे थे और मैंने मस्ती में बता दिया कि एकदम मस्त लगी. तभी तपाक से उन्होंने कहा कि “हाँ उसे तुम्हारे भाई के लिए दिख रहे हैं”.
फिर न उनसे कहा गया और न हमसे सुना गया. कुछ सुनाई दे रही थी तो सबकी हंसी और हमने उन्हें सांत्वना दे दी कि चिंता की कोई बात नहीं क्योंकि “घी कहाँ गिरी तो दाल में”.
ताऊ की झेंप
Apr 2nd
बात सन् ९७ की है. मैं उस दौरान अपनी पहली नौकरी में था. घर से दफ्तर तक आने-जाने के लिए ऑटोरिक्शा ले लिया करता (इसका भी एक कारण है कभी इत्मीनान से बताऊँगा) . फिलहाल तो आपको यह बता दें कि पटना में बहुतेरे ऑटोरिक्शा का पिछ्वारा काट कर तीन और लोगों के बैठने की जगह बना दी जाती है. वैसे तो यह गैर-कानूनी है पर उस पर आप ध्यान न दें. क्योंकि हमारा मानना है कि ऐसे मनाही वाले कानून एक खास सरकारी कर्मचारी वर्ग के बीवियों की फरमाईशें पूरी करने के लिए बनाई जाती हैं.
खैर! तो मैं कह रहा था कि, कुल जमा के ऑटो में तीन बीच में, तीन पीछे में और दो चालक लोग को सहारा देने के लिए उसके आजू-बाजू में बैठा करते थे. जगह की थोड़ी तंगी होती थी पर काम चल जाता था. पर यदि किस्मत से कोई खाते-पीते घर का खाता-पीता बन्दा या यदि यात्रा अच्छी बनी हो तो बन्दी बैठ गयी तो तंगी बढ़ जाया करती थी.
ऐसे ही एक दिन जब लोग बैठ ही रहे थे, आख़िरी सवारी एक ताऊ जी निकले. उन्हें बैठने में थोड़ी तकलीफ हुई, सड़क पर भी घर से ऑटो तक आते हुए उनको भीड़ का सामना करना पड़ा था. और उनके मन का विसाद निकला पड़ा और कह पड़े “आबादी कितनी बढ़ गयी है”.
झल्लाए तो सब थे. यह तो रोज का काम था. पर मुझसे रहा न गया और हठात पूछ बैठा “ताऊ गलती किसकी है”? ताऊ के दुर्योग से उस दिन बाकी सभी युवा ही थे. हठात सभी ठठा कर हंस पड़े. फिर अगले पांच किलोमीटर का सफ़र सबने चुप-चाप गुजारा, पर सबों की दबी-दबी मुस्कराहट और ताऊ का झेंपना साफ़ झलक रहा था.
हाँ आपको बता दूं कि वे हमारे ताऊ रामपुरिया तो बिलकुल नहीं थे, हो भी नहीं सकते नहीं तो वे मुस्कुरा रहे होते और हम झेंप रहे होते.
मदारी-2
Apr 2nd
मदारी: जमूरे!
जमूरा: हाँ उस्ताद.
मदारी: खेल दिखायेगा?
जमूरा: सच्चा की झूठा?
मदारी: झूठा तो बहुत देखा पब्लिक ने. अब सच्चा दिखा.
जमूरा: फिर तो फरमाईशी कार्यक्रम होगा. बोल उस्ताद क्या दिखाऊँ?
उस्ताद, इलेक्शन का टाइम है, कुछ उसी पर दिखा.
जमूरा: उस्ताद, इलेक्शन का नाम मत लो (..और रोने लगता है).
मदारी: अब्बे, क्या हो गया? बाप मर गया या माँ भाग गयी?
जमूरा: बाप तो तू ही है और तेरी बीवी भागे तो मेरे ठेंगे से.
मदारी: तो क्या हुआ?
जमूरा: मैं इलेक्शन में खडा होने वाला था पर अब नहीं.
मदारी: बाप से मजाक करता है?
जमूरा: नहीं उस्ताद, सच कह रहा हूँ. मैं इलेक्शन में खडा होने वाला था.
मदारी: चल मान लेता हूँ, फिर क्या हुआ?
जमूरा: मैंने पब्लिक को बोला मैं हिन्दू हूँ, पब्लिक की बहन ने अन्दर कर दिया.
मदारी: ये तो बुरा हुआ. चल जाने दे. खेल दिखा.
जमूरा: अब तो मैं जेल में हूँ. (कह कर भाग खड़ा होता है).
चतुर
Mar 31st
अवकाश से लौटते हुए
एक हमसफ़र बच्चे से पूछा
मुझे भी अपने साथ ले चलोगे
मैं तुम्हारे साथ
तुम्हारे कमरे में ही रह लूँगा.
मुस्कुराया
सोचा
और कहा
हमारे यहाँ खाने की मेज के साथ तीन ही कुर्सियां हैं

आपने कहा