परिचर्चा

एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग

कितना उसने मुझे सताया

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रात बहुत अंधियारी थी और
इन्द्रदेव का मूड अलग था
नही जानता मैं अज्ञानी कि
प्रसन्नता या कुछ कारण और.

झम झम करके रही नाचती
सुकुमारी बरखा सारी रात.
बिजली रानी के वियोग में
नही सूझते हाथों को हाथ.

बात राज की बतलाऊंगा अब
हँसना ना तुम हे प्रिय सिरमौर.
कल रात स्वामिनी मेरे घर की
करती रही एक उजड्ड संग घुरदौड़.

क्या बतलाऊँ कैसे बतलाऊँ
है कितना उसने मुझे सताया.
आकर मध्य युगल के उसने
कितना उसने हमें जलाया.

हया-दया ना धर्म है उसको
था गाना उसके कान में गाता.
वो तो बस छूने ही वाला था
कि उठकर निकाला मैंने छाता.

हुआ दरअसल ऐसा कुछ मित्रवर
लगी मुझ को भाग्य से लघु शंका.
और हड़क कर दुबका कहीं वो राक्षस
जैसे हनुमान स्वयम् पहुँचे हो लंका.

पर “ढीठ” कहाँ है ऐसे मानते
हो गया शुरू फिर वहीं वह प्रचंड.
चूम ही डाला मेरे प्रियतम को
जैसे करता कोई मनचला उद्दंड.

और फिर मुझ बदकिस्मत को देखें
कैसे कहूँ कहाँ कहाँ उसने है काटा.
जब जब मैंने किया वार घात को
खाना पड़ा अपने मुँह पर ही चाँटा.

देर से जागी पर जागी बुद्धि मेरी
स्मृत हुआ बुजुर्गों से सुना उपाय.
वही किया हमने जो सब हैं करते
भगा दिया दुष्ट को कछुआ जलाय.

Mosquito_coil

ताऊ की झेंप

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बात सन् ९७ की है. मैं उस दौरान अपनी पहली नौकरी में था. घर से दफ्तर तक आने-जाने के लिए ऑटोरिक्शा ले लिया करता (इसका भी एक कारण है कभी इत्मीनान से बताऊँगा) . फिलहाल तो आपको यह बता दें कि पटना में बहुतेरे ऑटोरिक्शा का पिछ्वारा काट कर तीन और लोगों के बैठने की जगह बना दी जाती है. वैसे तो यह गैर-कानूनी है पर उस पर आप ध्यान न दें. क्योंकि हमारा मानना है कि ऐसे मनाही वाले कानून एक खास सरकारी कर्मचारी वर्ग के बीवियों की फरमाईशें पूरी करने के लिए बनाई जाती हैं.

खैर! तो मैं कह रहा था कि, कुल जमा के ऑटो में तीन बीच में, तीन पीछे में और दो चालक लोग को सहारा देने के लिए उसके आजू-बाजू में बैठा करते थे. जगह की थोड़ी तंगी होती थी पर काम चल जाता था. पर यदि किस्मत से कोई खाते-पीते घर का खाता-पीता बन्दा या यदि यात्रा अच्छी बनी हो तो बन्दी बैठ गयी तो तंगी बढ़ जाया करती थी.

ऐसे ही एक दिन जब लोग बैठ ही रहे थे, आख़िरी सवारी एक ताऊ जी निकले. उन्हें बैठने में थोड़ी तकलीफ हुई, सड़क पर भी घर से ऑटो तक आते हुए उनको भीड़ का सामना करना पड़ा था. और उनके मन का विसाद निकला पड़ा और कह पड़े “आबादी कितनी बढ़ गयी है”.

झल्लाए तो सब थे. यह तो रोज का काम था. पर मुझसे रहा न गया और हठात पूछ बैठा “ताऊ गलती किसकी है”?  ताऊ के दुर्योग से उस दिन बाकी सभी युवा ही थे. हठात सभी ठठा कर हंस पड़े. फिर अगले पांच किलोमीटर का सफ़र सबने चुप-चाप गुजारा, पर सबों की दबी-दबी मुस्कराहट और ताऊ का झेंपना साफ़ झलक रहा था.

हाँ आपको बता दूं कि वे हमारे ताऊ रामपुरिया तो बिलकुल नहीं थे, हो भी नहीं सकते नहीं तो वे मुस्कुरा रहे होते और हम झेंप रहे होते.

मदारी-2

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मदारी: जमूरे!
जमूरा: हाँ उस्ताद.
मदारी: खेल दिखायेगा?
जमूरा: सच्चा की झूठा?
मदारी: झूठा तो बहुत देखा पब्लिक ने. अब सच्चा दिखा.
जमूरा: फिर तो फरमाईशी कार्यक्रम होगा. बोल उस्ताद क्या दिखाऊँ?
उस्ताद, इलेक्शन का टाइम है, कुछ उसी पर दिखा.
जमूरा: उस्ताद, इलेक्शन का नाम मत लो (..और रोने लगता है).
मदारी: अब्बे, क्या हो गया? बाप मर गया या माँ भाग गयी?
जमूरा: बाप तो तू ही है और तेरी बीवी भागे तो मेरे ठेंगे से.
मदारी: तो क्या हुआ?
जमूरा: मैं इलेक्शन में खडा होने वाला था पर अब नहीं.
मदारी: बाप से मजाक करता है?
जमूरा: नहीं उस्ताद, सच कह रहा हूँ. मैं इलेक्शन में खडा होने वाला था.
मदारी: चल मान लेता हूँ, फिर क्या हुआ?
जमूरा: मैंने पब्लिक को बोला मैं हिन्दू हूँ, पब्लिक की बहन ने अन्दर कर दिया.
मदारी: ये तो बुरा हुआ. चल जाने दे. खेल दिखा.
जमूरा: अब तो मैं जेल में हूँ. (कह कर भाग खड़ा होता है).

मदारी

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मदारी: जमूरे!
जमूरा: हाँ उस्ताद.
मदारी: तुमने सुना?
जमूरा: क्या उस्ताद?
मदारी: चुनाव होने वाला है.
जमूरा: हाँ उस्ताद, मैं भी खड़ा हूँ.
मदारी: मजाक मत कर.
जमूरा: वो तो पब्लिक से करूंगा.
मदारी: क्या सोच कर खड़ा हुआ?
जमूरा: प्रधानमंत्री बनना है.
मदारी: औकात में रह.
जमूरा: उस्ताद, एक बात बोलूँ?
मदारी: बोल.
जमूरा: एक प्रधानमंत्री जमूरा बन गया तो एक जमूरा प्रधानमंत्री क्यों न बने?
मदारी: खेल ख़त्म हुआ पैसे मांग.
जमूरा: नहीं मिलता है उस्ताद अभी रिसेस्सन है
मदारी: स्विस बैंक से मांग
जमूरा: पच्चीस लाख करोड़ तो अपने हैं, वही न उठा कर दे दें.

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