एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
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कुछ नया नहीं
Mar 8th
अभी अभी श्रीमती जी स्नान कर के निकलेंगी, फिर मेरा क्लास लेंगी. “अभी तक आप यहाँ बैठे हैं, नहाये नहीं?”
गुलेल बनाऊँगा और चिडिया मारूंगा
Mar 5th
बचपन में हर बच्चे को लोग पूछते रहते हैं कि वह बड़ा हो कर क्या करेगा. ऐसा ही एक लड़का था जो इस प्रश्न का उत्तर हर बार एक ही देता था “बड़ा हो कर गुलेल बनूंगा और चिडिया मारूंगा”. शुरू शुरू में तो उसके माता पिता ने बच्चे की नादानी या मश्खारी समझ कर ताल दिया, परन्तु जब बच्चा सब कुछ समझने बूझने लायक हो गया तो भी उसका यह उत्तर न बदला.
परेशान हो माँ बाप ने हर तरफ मदद की गुहार लगाई और अखिरतः उन्हें एक मनोवैज्ञानिक का पता मिला जो ऐसे बच्चों को सही रस्ते पर सोचना सिखाता था. बच्चे को उस मनोवैज्ञानिक के पास ले जाया गया, तो सलाह दी गयी कि उसे कुछ हफ्ते वहीं छोड़ दिया जाये. तथास्तु “हारे को हरिनाम” वाली हालत में माँ बाप बच्चे को वहीं छोड़ आये.
जब बच्चा वापस लौटा तो कुछ समय तक किसी ने कुछ नहीं पूछा परन्तु माँ बाप ने उत्सुकतावश उससे पूछ ही डाला कि “बेटा बड़े हो कर क्या करोगे?”
बेटे ने इत्मीनान से जवाब दिया:
“पहले तो मैं बहुत ही मन लगा कर पढूंगा और इस लायक बनूँगा कि विदेशों में एक बड़ी सी नौकरी मिले. बहुत काम और नाम करूंगा, पैसे भी बचूंगा और जब ढेर सारा पैसा होगा तो वापस आऊँगा शादी करने. शादी में दहेज़ भी लूँगा. दहेज़ में सब कुछ लूँगा, घर, पैसा, गहने, कपडे यहाँ तक कि अंडरवियर भी. और जब वो अंडरवियर पुराने हो जायेंगे तो उनके रबर से गुलेल बनूँगा और चिडिया मारूंगा”.

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