परिचर्चा

एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग

ख़त्म तो नहीं होंगे ना, वही बहुत है

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बंगलोर से गाँव जाने का रास्ता ५४ घंटे का है (यदि भारतीय रेल के समय सारणी पर विश्वास करें तो) पर मुझे कुल ६२ घंटे लगे. इसका पूर्वानुमान होने की वजह से मैं दो किताबें ले कर चला था. पर गर्मी, ट्रेन में पैंट्री कार का न होने की वजह से खाद्य पदार्थ व चाय पानी का अभाव, और अकर्मण्य हो कर न सो पाने की बुरी आदत से ग्रसित होने के कारण दोनों को मुगलसराय से पहले ही चाट डाली. Read the rest of this entry »

हमें नहीं चाहिए सम्मान, क्या कल्लोगे?

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हाँ सुना था हमने भी. चिल्ला रहे थे मीडिया वाले – “सुनो सुनो सुनो! दो सिंह को सरकारी तमगे के लिए बुलाया गया”.

किसी ने हमारे मन की बात सुनी? आपकी मर्जी हुई और आप हमारे पैसे कमाने वाले रोजी रोटी पर फ़िदा हो गए. कर दिया घोषणा कि “भई आओ एक तमगा ले लो”. उ का कहते हैं कि राष्ट्र के गौरव हो, धरती के पुत्र हो आदि इत्यादि.

नाम हमारा सिंह है पर काम तो हम बैल का ही करते हैं. अभी हमको कुछ दिन का काम और मिला है.  उसी बीच में आप सम्मान का सम्मन भेज दिए. हम खेलते हैं अपने लिए और आप मान चले कि हम खेलते हैं देश के लिए. यदि ऐसा होता तो हमरे जैसे हजारों अपनी अपनी गली में देश के लिए भागम भाग मचाये रहे हैं, काहे नहीं उन्ही को दे दिए दू चार ठो सम्मान? दू-चार करोड़ रूपया कमाने का जुगाड़ बैठा है और आप हैं कि फोटो खिंचवाने के लिए बेताब हुए जा रहे हैं.

हमरे कौन से करम से आपको लगने लगा कि हम देश-सेवा कर रहे हैं? देश-सेवा तो आप लोग कीजिये. हम कौन सा चुनाव जीते या मानवाधिकार के काम किये या कहीं जा कर लोक-सेवा की? नहीं, आखिर कौन सी गलती हो गयी जो जबरदस्ती गले में तमगा लटकाने पर पड़े हो? या कि आपको ऊ साईमन को बन्दर कहने वाला झगडा याद आ गया, या श्रीसंत को थप्पड़ मारी वो अच्छा लगा, या मैसूर संदल सोप का प्रचार करने का ठेका ले कर ठेंगा दिखा दिया वो अच्छा लगा. हम जैसे-तैसे लड़ मर कर यहाँ पहुंचे कि कुछ पैसे कमा सकें. जब हम भटक रहे थे तब तो आपको न याद आया कि “इसको बनाओ ई बाद में सम्मान पाने के लायक बनेगा”. जाइये न, बहुत से पड़े हैं गलियों में, एक आध को बना दीजिये.

देखा था हमने भी आपने “अभिनव” को कैसे तमगा लटकाया और वह गरिया रहा था कि हमें इस लायक बनाने में आपका कोई हाथ नहीं है. आपके भरोसे होते तो तमगा तो छोडिये टिकट मिलना भी मुश्किल होता ओलिम्पिक का.

नहीं कुछ तो बताएं जो आपके मन पर  कौन सा चीज बोझ बन बैठा है जिसे  आप हमरे गले में लटकाने पर उतरे हुए हैं? आप नाराज कि फोटो खिंचवाने नहीं आया, मीडिया नाराज कि उनको फोटो खींचने का और टी आर पी बढ़ने का मौका नहीं मिला, और तो और आज कल ब्लॉग और पत्रों में भी सभ के सभ गरियाने पर उतरे हुए हैं.

अरे! याद नहीं है आपको हमने ठेका लिया है खेलने का? लोगों ने हमें खरीदा है करोडों रुपये लगा कर? ठेका टूट गया तो आपका तमगा बेच कर  हमको पैसा मिलेगा? सम्मान लेने का टाइम आएगा जरा खेल का टाइम ख़तम होने दीजिये, रिटायर होने दीजिये. अभी तो हमारे खेलने कमाने के दिन हैं और आप हैं कि जबरदस्ती चालू हैं “सम्मान ले लो”. अब नहीं आ पाए लेने तो बजाय हमारी मजबूरी और फीलिंग्स को समझने के बजाय “सम्मान नहीं लिया, तुमको जेल भेज देंगे” चिल्लाये  जा रहे हो.

हमें नहीं चाहिए सम्मान, क्या कल्लोगे?

आपको आपकी रचना कैसी लगी?

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हम अक्सर जब भी कुछ लिख कर उठते हैं तो सोचते हैं कि आज हमने बहुत ही धाँसू रचना की है. क्या कहें इतना बड़ा तीर मारा है कि आज तो साहित्य के स्तम्भ उखड़े ही उखड़े. लोग तो बस, क्या कहने हैं. पढ़ते ही झूम उठेंगे. सामने होता तो कहीं हाथ ही न चूमने लगें. पर यह भ्रम टूटने लगता है जब कोई वाहवाही नहीं आती. और कभी वाहवाहियों का सिलसिला रुकता ही नहीं. है ना? और हम फूलते चले जाते हैं मेले में घुमते गुब्बारे के बने जानवरों की तरह.

तो जैसा कि बुजुर्ग ब्लॉगरगण कितनी बार दुहरा चुके हैं कि टिप्पणियों का आपकी रचना के गुणवत्ता से एकदम सीधा संपर्क नहीं होता. ऐसे में आप कैसे निर्णय लेंगे कि आपकी अमुक रचना अतिउत्तम, उत्तम, सामान्य या निकृष्ट है. मैं तो उस रचना को अच्छा कहूँगा जिसे पढने में कम से कम मुझे कभी अपनी समझ में कमतर न लगे. लोग वाह वाह करते हैं तो इसका तात्पर्य होगा कि मैं ज्यादा लोगों के समझ के बराबर सोचता हूँ, नहीं तो कम लोगों के. अब यह अलग बात है कि जिन कम लोगों के साथ मेरा मानसिक तारतम्य बैठता है वे स्तर से ऊपर हैं या नीचे. और इसके लिए कोई फुट-मीटर वाला डंडा तो है नहीं कि लोग निर्णय ले लेंगे कि अमुक ज्यादा समझ वाला है और अमुक कम.

तो मैंने एक प्रयोग किया अपनी ही रचनाओं के ऊपर. उन रचनाओं को जो कुछ समय पहले लिखी थी. जिस पर से मेरी और अन्य पाठकों की दृष्टि नहीं रही, फिर से पढ़ा. कई बार लगा “मजा नहीं आया”, कई बार लगा यह इससे ज्यादा अच्छा हो सकता था. और अच्छे शब्द का प्रयोग या पंक्तियों की संरचना की जा सकती थी. अन्तर्निहित भाव को और भी प्रबल बनाया जा सकता था. पर एक बात पर दुःख हुआ कि अभी तक कभी यह नहीं लगा कि हाँ “यह हुई ना बात”.

ये बातें मैं साहित्य के ज्ञान होने की वजह से नहीं कर रहा, वह तो मुझे बिलकुल नहीं है. यह मेरे प्रयोग का फल है. आप इस प्रक्रिया को साहित्य में क्या कहेंगे यह मुझे नहीं पता. पर मैं जानना चाहता था कि यदि आप ने कभी अपनी पुरानी रचनाओं का पुनरावलोकन किया हो तो क्या आपको अपनी ही रचना अच्छी लगी? यदि हाँ तो कितनी बार? क्या उसे प्रतिशत में बताया जा सकता है? कैसा महसूस हुआ आपको?

बताइए ना, आप भी अपने अनुभव.

मैं एक प्रयास कर रहा हूँ उन रचनाओं और उनमे सुधर की एक सूची बनाने की, जो मुझे आज उतने अच्छे नहीं लगते जितना कि लिखते वक़्त लगे थे. भाव आज भी अच्छे हैं पर रचना स्वयं में कमतर लगती है. जैसे कि कुछ छूट गया हो. उसे कभी बाद में प्रस्तुत करूंगा.

हम वोट क्यों दें?

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एक बार नजर दौड़ाईए देश के उन व्यक्तियों पर जो संभावित रूप से प्रधानमंत्री बन सकते हैं और फिर बताईये कि आपको यह नहीं लगता कि आप से कहा जा रहा है कि “इन बेशर्मों और बेगैरतों में से एक को अपना प्रधानमंत्री चुन लो”.

आप कहेंगे कि इन पार्टियों को वोट ना देकर किसी निर्दलीय या किसी तीसरी चौथी पार्टी के उमीदवार को वोट दीजिये.

तो? हल मिल गया?

वैसा उम्मीदवार अमूमन तो मिलेगा नहीं और मिल गया तो जीतेगा नहीं. चलिए मान लिया कि उसकी किस्मत जीतने की है और वह जीत गया. फिर वह क्या करेगा? किसी एक बेगैरत इंसान के साथ चिपक जायेगा. फिर पांच साल हम भकुआ की तरह उनका मुंह देखें और अपना सर धुनें. यही हमारी नियति है?

नहीं यह हमारी नियति नहीं है. यह हमारे सामुदायिक दायित्व से मुंह फेरने का नतीजा है. ऐसा इसलिए हो रहा है कि हम राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहते. हम उसके दर्शक हैं जो दूर खड़े तमाशा देखते हैं. फिर सिर धुनते हैं कि तमाशा ठीक नहीं हो रहा. फिर खुद करो ना तमाशा, किस ने रोका है? उठो स्वयं और खड़े हो जाओ मंच पर. डरते क्यों हो? तुम जैसे हजारों जब तक नहीं आते, और उनमे से उन्नत निकल कर वृहद् अकार नहीं लेते, तमाशा तो ऐसा ही होता रहेगा. अब तुम्हारे पास दो रास्ते हैं. एक कि स्वयं तमाशाई बन कर खड़े हो जाओ या फिर अच्छे तमाशबीन बन कर वोट करो. फिर तुम्हारे हाथ में होगा कि तुम किस का तमाशा देखना चाहते हो. कौन सबसे बेहतर है.

सबसे बेहतर का अर्थ यह नहीं कि पूरे देश में कौन सबसे बेहतर है. तुम्हे उन्ही में से चुनना होगा जो अपना सब कुछ छोड़ (यदि छोडा हो तो) कर तमाशा दिखाने आये हैं. अब उन में से कुछ लालच में आये हों और कुछ सुच्चा कलाकार हों, यह वाजिब है. और तुम्हे इस तमाशे में हर बार शामिल होना होगा. चयन इमानदारी से करते रहो. घटिया कलाकार तो स्वयं खेल से बाहर हो जायेंगे.

नहीं मानते तो संगीत को लीजिये, सिनेमा को लीजिये. आप ख़राब कलाकारों को धीरे धीरे निकालते जाते हैं और बच जाते हैं आपके पास घिस कर निकले हुए चमकते सितारे. ठीक उसी तरह नेता भी एक दिन में नहीं बनता. आपकी पसंद को भी घिसना होगा, उसे भी कई परीक्षाओं में पास होना होगा. और वह परीक्षा आप लेते हैं. आपके विचार से ही वह उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण होता है. और जो बार बार उतीर्ण होता आया वही सबसे आगे की कतार में खडा है. उसे भी बार बार उतीर्ण कर के वहां तक भेजा आया है जहाँ से वह आपको साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा है. अब यदि वह, जो दूर खडा सबसे ऊपर दिख रहा है, आपको पसंद नहीं है, तो जो पसंद है उसे आगे बढाईये.

इसीलिए वोट दो.

हाँ यह मानसकिता का ही सवाल है

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अभी अभी डाक्टर कुमारेन्द्र ने लिखा..

http://kumarendra.blogspot.com/2009/04/blog-post_4964.html

हाँ यह मानसकिता ही है. अक्षय कुमार का सरेआम जींस के बटन खुलवाना और एक महिला का स्लीवलेस और मिनी स्कर्ट पहन कर बाजार जाना दोनों एक ही तराजू में नहीं रखे जा सकते.  एक महिला एक पुरुष के बटन कुछ अन्तरंग क्षणों में ही खोलती है जिसका सार्वजानिक किया जाना उचित नहीं. उस जींस कंपनी का उद्देश्य भी यही था कि यदि आप यह जींस पहनते हैं तो महिलाएं इस खोलने से अपने आपको रोक नहीं पाएंगी. जबकि किसी महिला का स्लीव्लेश और मिनी स्कर्ट पहन कर घूमना यह नहीं कहता कि आओ मेरे साथ सम्भोग करो.

आप ही की बात को आगे बढाते हुए…

इस से सहज कुछ हो ही नहीं सकता कि आप अपनी कमजोरियों के बदले किसी और के गुण या अवगुण पर दोषारोपण कर दें. मैं इसलिए नहीं गरीब हूँ कि मैं कामचोर और अकुशल हूँ, मैं इसलिए गरीब हूँ क्योंकि कोई मुझसे ज्यादा मेहनती और कुशल व्यक्ति बाजार से एक बड़ा हिस्सा ले जाता है.

ठीक इसी तरह बलात्कारी होते हैं. आप अपनी मानसिक कुंठा को दोष न दे कर महिलाओं के वस्त्र, उनकी जीने की आजादी और उन्मुक्त व्यव्हार और विचार को दोष दे दीजिये. मैंने देखा है लोगों को विक्षिप्त महिलों से छेड़खानी करते हुए, यहाँ तक कि उनका बलात्कार भी होता है.  उनमे तो यह बोध भी नहीं कि नग्नता क्या होती है.  बूढी औरतों का बलात्कार करने को कौन से कपडों ने उकसाया. बच्चियों का बलात्कार क्यों होता है?

आपने समाज की दोहरे उसूलों वाली व्यवस्था को दोष दिया है जिस से मैं भी थोड़ा बहुत सहमति रखता हूँ. पर महिलाओं के जीवन शैली से आप कुकृत्य करने पर उतारू हो जाते हैं तो दोषी महिलाएं नहीं आप हैं. आप मानसिक रूप से कमजोर हैं और आपको यह नहीं सूझता है कि आप को अपने कुंठित यौन विचारों को कैसे दमित करना है.

एक सीधा सा प्रश्न है एक महिला किसी भी कारणवश आपके सामने नग्न भी हो जाये और वह नहीं चाहती की आप उसे छुएँ तो क्या आप बलात्कार का रास्ता अख्तियार कर लेंगे?

पश्चिम में बलात्कार है या नहीं सिर्फ एक शब्द से निश्चित किया जाता है “सहमति”. चाहे वह दो प्रेमी प्रेमिकाओं के बीच ही क्यों न हों, यहाँ तक की वेश्याएं भी बलात्कार का शिकार होती हैं. वहां का कानून और समाज एक बात हरेक पुरुष को अवश्य सिखाता है कि किसी भी महिला को बिलकुल न छुओ यदि उस वह “न” कहे या प्रतिरोध करे.

हमारे समझ को यह सीखना होगा कि महिलाओं के साथ रह कर उनके स्वछंदता को देखते हुए हम कैसे अपने आप को संयमित और संस्कृत रखते हैं.

मैं आप से सहमति रखता हूँ कि ऐसी कुंठित मानसकिता वाले लोगों का या तो इलाज हो या इन्हें समाज से अलग कर दिया जाये. पर समस्या यह है कि यदि हम ऐसा करें तो हमारे समाज का बड़ा हिस्सा या तो कला-पानी के लायक है या मानसिक इलाज के. वास्तव में हमें स्वयं को सुधार कर आने वाली संतति को मजबूत और उदार विचारधारा देनी होगी.

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