एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
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वैलेंटाइन डे
Feb 13th
लो आ गया प्यार के इजहार का दिन,
जोड़े हाथों में हाथ डाल घूमते नजर आएंगे
और अख़बारों में आयेगी कुछ रंगीन तस्वीरें
टीवी चैनल्स एक ही बात बकते दिन बिताएंगे
फिर श्रीमान मुतालिक और उनके साथी
अख़बारों में अपनी करनी से छप जायेंगे
और होगी साथ में कुछ चटपटी खबरें
कुछ सितारों की और कुछ लोकल तस्वीरें
फिर कल होगा, और लोग इस दिन को भी
एक आम दिन की तरह शायद भूल जायेंगे
चौराहे पर जो कल हाथों में हाथ डाले घूमते हैं
कल वो राशन की कतारों में नजर आएंगे
आज जिनसे छूटता नही एक पल का साथ
किस्मत ने चाहा तो वे पति पत्नी कहलायेंगे
शायद जिंदगी की उलझनों में उलझ कर
कहीं किसी मोड़ पर झगड़ते भी नजर आएंगे
सुबह, शाम, दिन और रात वैसी ही रहेगी
हम कुछ झुर्रियों से थोड़े और बूढे हो जायेंगे
जब हम देखेंगे उल्लुओं की तरह टीवी
हमारे बच्चे भी कहीं वैलेंटाइन डे मनाएंगे
आपस का प्यार तो उतना ही रहता है हमेशा
बस इजहार करने की आदत है चली जाती
अच्छा है साल में यह एक वैलेंटाइन डे है
वरना आई लव यू कहने की रिवाज चली जाती
फिर वैलेंटाइन डे
Feb 2nd
फिर वैलेंटाइन डे
इंतजार कीजिये वैलेंटाइन डे को होने वाले उन घटनाओं का जो हर साल की भांति इस साल भी शायद हमारे संस्कृति रक्षक दुहराएंगे. लड़के लड़कियों को पार्क, मॉल वगैरह से भगायेंगे. कुछ जगह शायद हाथ पाँव भी चले पर अभी तक किसी भी राज्य की सरकार ने शायद इस पर सोचा न हो.
ऐसा नही है की मैं वैलेंटाइन डे का समर्थक हूँ पर विरोधी भी नही हूँ. आज कल इतने सारे डे हैं एक साल में मनाने वाला अगर कैलेंडर में तारीखों को रंगने लगे तो शायद कोई भी दिन सफ़ेद न रह जाए. और उनमे से यही एक डे है जिसका विरोध प्रखर रूप में होता है और वह भी सिर्फ़ कुछ विशिष्ट समूहों के द्वारा. तर्क यह है की यह हमारी संस्कृति को भ्रष्ट करता है. शायद कुछ हद तक सही भी है, क्योंकि रीति रिवाजों के आड़ में कुकर्म करने वालों की कमी कभी नही हुई. गरवा नाइट्स भी एक ऐसा ही त्यौहार है जिसके बाद अख़बार गर्भपात के आकंडों से भरे होते हैं. पर उनका विरोध संस्कृति के नाम पर नहीं होता. लेख आलेख वगैरह आते हैं पार कभी इसका प्रखर विरोध नही हुआ. ना ही किसी ने इसे निषिद्ध घोषित करने की अपील की. गरवा नाइट्स भी गुजरात से चल कर दुसरे प्रान्तों और फिर विदेशों में ठीक वैलेंटाइन डे की तरह प्रचलन में आया है.
सच मानिये तो गरवा का विरोध जो भी करेगा वह पोपुलारिटी तो बिल्कुल नही कमा पायेगा उल्टा उसकी हालत किसी बर्रे के छत्ते में हाथ डाले हुए बच्चे जैसी हो जायेगी. सेंसेशन तो क्रिएट होगा पार उसका कोई राजनितिक फायदा नहीं होने वाला. परन्तु चर्चे में बने रहने और थोड़े बहुत दकियानुशों का वोट पाने के लिए वैलेंटाइन डे का विरोध करना महंगा सौदा नही है. खाश कर के जब सरकारें एक नपुंसक की तरह बयान देने से ज्यादा कुछ नही कर सकती. आजतक किसी भी उपद्रवी को ऐसी सजा नही मिली जो उसके समाज को याद रहे. जो लड़के बस जलने जैसा दुस्साहस करते हैं अगर उनसे एक बस की कीमत अदा करवा ली जाए तो शायद दूसरा कोई भी ऐसी हिम्मत नही करेगा.
इन लोगों को कोई नैतिक उद्देश्य नही चाहिए. जब तक कठोर कानून बनाकर और उसपर अमल कर के उपद्रवियों को दण्डित नही किया जाता ऐसी घटनाएँ होती रहेंगी.
कानून बनाना और उसपर अमल करवाना तो एक दूरगामी उपाय है, तत्काल मंगलौर जैसी किसी भी घटना को रोकने के लिए अच्छा होगा अगर राज्य सरकारें इस दिन चौकसी बरते और ऐसे जगहों पार जहाँ युवा वर्ग इकत्रित होते हों की शान्ति बनाये रखने के इंतजामात करे.
मेरी दुविधा
Jan 29th
आज अख़बार में पढ़ा की एक आदमी को ऑस्ट्रेलिया ने नौकरी से इस लिए निकाल दिया की वो शौचालय में पानी का प्रयोग करता था. यह सन्दर्भ मात्र है. मैं लन्दन गया हूँ और वहां शौचालय में पानी का प्रबंध ही नही मिला. अब मैं यह तो नही जनता कि पानी का प्रबंध था परन्तु प्रयोग की मनाही थी या वह व्यक्ति अपने घर से लोटा…इस्स्स गलती हो गयी, बोतल ले कर आया था या किसी और माध्यम से जैसे कि काफ़ी का मग बगैरह वगैरह ले गया था.
अब मुझे चिंता हो रही है तथाकथित धर्म के पहरेदारों की. क्या वे अपने बच्चों को सिक्षा या नौकरी या व्यवसाय के लिए विदेश जानते देते हैं? आज भी हमारे यहाँ हमारी माता घर में कुछ भी नही छूने देंगी अगर उन्हें पता चले कि अमुक व्यक्ति शौचालय के बाद जल का प्रयोग नही करता.
फिर ख्याल आया मंगलोर घटना का, वैसे तो अपने यहाँ यह सब चलता ही रहता है. ऐसे बहुत सरे दिग्गज हैं हमारे यहाँ जो “मुक्खे कानून छ” में विस्वास रखते हैं और उनका कानून चलता भी है. चाहे हमारे नेता कितना ढोल पीट ले कि कोई भी कानून से ऊपर नही है. अरे मन ऊपर न सही बराबरी तो करता है ना.
इसी कड़ी में यह भी याद आता है कि इन्द्र देव की सभा में अप्सराएँ नाच रही होती थी और देव सुरा का पान करते थे. मैं इस बहस में तो नही पड़ता कि वो कैसे क्या करते थे और यह कितना प्रमाणित है कि वो ऐसा कुछ करते भी थे या नही. परन्तु हमें बचपन से ले कर आज तक जब भी स्वर्ग के किस्से सुने इन्द्र का नाम सुना और जब इन्द्र का नाम सुना तो अप्सराएँ और सुरा का नाम अवश्य सुना. यदि आज के समय में इन्द्र यहाँ होते तो क्या उन्हें पब्लिक वैसे ही नही पीट देती जैसे कि मंगलौर में लड़कों को पीटा गया? क्या लोग अप्सराओं पर भी हाथ उठा देते?
धर्म और संस्कृति की रक्षा जबरन नही हो सकती. लिबास या जीने के तरीकों से संस्कृति को कोई फर्क नही पड़ता. जब हमारे पूर्वज धोती में थे या उसके बिना भी रहे हों तब भी उन्होंने विकास किया, धर्म और संस्कृति को बनाया, संवारा और हमें विरासत में दिया. हमारे पिता की पीढी जो खानदान में पहली पायजामा पहनने वाली पीढी थी ने हमें सिखाया कि औरतों को सम्मान दो, अपने धर्म को जानो, बड़ों और अजनबियों से आदर से बात करो. वगैरह वगैरह.
धर्म और संस्कृति का पतन तब होता है हमें उनकी जरूरत समझ में नही आती. और जिन्हें आज जरूरत समझ में नही आती ऐसा नही है कि उन्हें हमेशा ऐसा ही महसूस होगा. जीवन के हर पड़ाव पर जरूरत अलग अलग होती है. आज की पीढी अपने आप को राजकुमारों की तरह रखती है. और जब उनका जोश ठंडा पड़ता है तो वे भी धर्म, संस्कृति, समाज की तरफ़ देखेंगे. और यदि नही भी देखते तो यह कहाँ का न्याय है कि हम दूसरों से वही अपेक्षा करें जो हमें अच्छा लगता है?
हम जितनी शक्ति इन बातों में लगाते हैं उतनी शक्ति हम सरकार को सही तरह से काम करने पर मजबूर करने में लगायें तो शायद सब का भला हो.

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