हाँ सुना था हमने भी. चिल्ला रहे थे मीडिया वाले – “सुनो सुनो सुनो! दो सिंह को सरकारी तमगे के लिए बुलाया गया”.

किसी ने हमारे मन की बात सुनी? आपकी मर्जी हुई और आप हमारे पैसे कमाने वाले रोजी रोटी पर फ़िदा हो गए. कर दिया घोषणा कि “भई आओ एक तमगा ले लो”. उ का कहते हैं कि राष्ट्र के गौरव हो, धरती के पुत्र हो आदि इत्यादि.

नाम हमारा सिंह है पर काम तो हम बैल का ही करते हैं. अभी हमको कुछ दिन का काम और मिला है.  उसी बीच में आप सम्मान का सम्मन भेज दिए. हम खेलते हैं अपने लिए और आप मान चले कि हम खेलते हैं देश के लिए. यदि ऐसा होता तो हमरे जैसे हजारों अपनी अपनी गली में देश के लिए भागम भाग मचाये रहे हैं, काहे नहीं उन्ही को दे दिए दू चार ठो सम्मान? दू-चार करोड़ रूपया कमाने का जुगाड़ बैठा है और आप हैं कि फोटो खिंचवाने के लिए बेताब हुए जा रहे हैं.

हमरे कौन से करम से आपको लगने लगा कि हम देश-सेवा कर रहे हैं? देश-सेवा तो आप लोग कीजिये. हम कौन सा चुनाव जीते या मानवाधिकार के काम किये या कहीं जा कर लोक-सेवा की? नहीं, आखिर कौन सी गलती हो गयी जो जबरदस्ती गले में तमगा लटकाने पर पड़े हो? या कि आपको ऊ साईमन को बन्दर कहने वाला झगडा याद आ गया, या श्रीसंत को थप्पड़ मारी वो अच्छा लगा, या मैसूर संदल सोप का प्रचार करने का ठेका ले कर ठेंगा दिखा दिया वो अच्छा लगा. हम जैसे-तैसे लड़ मर कर यहाँ पहुंचे कि कुछ पैसे कमा सकें. जब हम भटक रहे थे तब तो आपको न याद आया कि “इसको बनाओ ई बाद में सम्मान पाने के लायक बनेगा”. जाइये न, बहुत से पड़े हैं गलियों में, एक आध को बना दीजिये.

देखा था हमने भी आपने “अभिनव” को कैसे तमगा लटकाया और वह गरिया रहा था कि हमें इस लायक बनाने में आपका कोई हाथ नहीं है. आपके भरोसे होते तो तमगा तो छोडिये टिकट मिलना भी मुश्किल होता ओलिम्पिक का.

नहीं कुछ तो बताएं जो आपके मन पर  कौन सा चीज बोझ बन बैठा है जिसे  आप हमरे गले में लटकाने पर उतरे हुए हैं? आप नाराज कि फोटो खिंचवाने नहीं आया, मीडिया नाराज कि उनको फोटो खींचने का और टी आर पी बढ़ने का मौका नहीं मिला, और तो और आज कल ब्लॉग और पत्रों में भी सभ के सभ गरियाने पर उतरे हुए हैं.

अरे! याद नहीं है आपको हमने ठेका लिया है खेलने का? लोगों ने हमें खरीदा है करोडों रुपये लगा कर? ठेका टूट गया तो आपका तमगा बेच कर  हमको पैसा मिलेगा? सम्मान लेने का टाइम आएगा जरा खेल का टाइम ख़तम होने दीजिये, रिटायर होने दीजिये. अभी तो हमारे खेलने कमाने के दिन हैं और आप हैं कि जबरदस्ती चालू हैं “सम्मान ले लो”. अब नहीं आ पाए लेने तो बजाय हमारी मजबूरी और फीलिंग्स को समझने के बजाय “सम्मान नहीं लिया, तुमको जेल भेज देंगे” चिल्लाये  जा रहे हो.

हमें नहीं चाहिए सम्मान, क्या कल्लोगे?