एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
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शायद अच्छाई हमेशा दूसरों में अच्छी लगती है
Sep 11th
मुझे चाहिये एक अच्छा सा रोजगार
क्योंकि मैं अच्छा पैसा कमाना चाहता हूँ
चाहिये एक अच्छी गाड़ी और एक अच्छा घर
एक अच्छी सी पत्नी और अच्छे बच्चे भी
और इससे अच्छा क्या होगा मेरे लिये?
यूँ तो मुझे तब भी अच्छा लगता है
जब कोई बाजी लगाता है देश के लिये
या हटाता है गली में पसरी गंदगी को
या फिर लड़ता है कहीं अन्याय के खिलाफ़
पर मैं ऐसा नहीं करना चाह्ता
क्योंकि उससे कुछ हासिल नहीं होता.
शायद ऐसा ही खयाल हर दिल में आता होगा.
पर क्या सोचते हैं वे लोग जो फिर भी
कुर्बान जाते हैं कुछ ऐसी अच्छाई पर
जिससे कुछ भी अच्छा नहीं होता उनके लिये.
मैं तो सब कुछ अच्छा पाना चाहता हूँ.
जो दूसरों का ख़याल करता हो
और जिसे परवाह हो
इस दुनिया और दुनिया के लोगों की
देखता हूँ उसे लोग अच्छा तो कहते हैं
पर कुछ भी अच्छा नहीं होता उसके साथ.
कल सुना एक सिपाही मर गया
कुछ घुसपैठियों को रोकने में
पर उसके घर का पहरेदार कौन होगा अब.
उसके पीछे तो एक जवान बीवी
और एक मासूम बच्ची भी है.
शायद अच्छाई हमेशा दूसरों में अच्छी लगती है.
नहीं तो ऐसा न होता कि उन घुसपैठियों को
देश के अंदर के लोग चुन चुन कर
कत्ल कर देते यह सोच कर कि
उन्होंने मारा है हमारे जवान को और
न जाने कितनों को निशाने पर रखा है.
चोरों, पॉकेटमारों और लफंगों को पीटने में
बहुतों ने हाथ आजमाया तो होगा.
पर क्या यह अच्छा नहीं होता कि
हर आदमी आजमाता इन घुसपैठियों पर.
शायद अच्छाई हमेशा दूर से ही अच्छी लगती है.
कितना उसने मुझे सताया
Sep 2nd
रात बहुत अंधियारी थी और
इन्द्रदेव का मूड अलग था
नही जानता मैं अज्ञानी कि
प्रसन्नता या कुछ कारण और.
झम झम करके रही नाचती
सुकुमारी बरखा सारी रात.
बिजली रानी के वियोग में
नही सूझते हाथों को हाथ.
बात राज की बतलाऊंगा अब
हँसना ना तुम हे प्रिय सिरमौर.
कल रात स्वामिनी मेरे घर की
करती रही एक उजड्ड संग घुरदौड़.
क्या बतलाऊँ कैसे बतलाऊँ
है कितना उसने मुझे सताया.
आकर मध्य युगल के उसने
कितना उसने हमें जलाया.
हया-दया ना धर्म है उसको
था गाना उसके कान में गाता.
वो तो बस छूने ही वाला था
कि उठकर निकाला मैंने छाता.
हुआ दरअसल ऐसा कुछ मित्रवर
लगी मुझ को भाग्य से लघु शंका.
और हड़क कर दुबका कहीं वो राक्षस
जैसे हनुमान स्वयम् पहुँचे हो लंका.
पर “ढीठ” कहाँ है ऐसे मानते
हो गया शुरू फिर वहीं वह प्रचंड.
चूम ही डाला मेरे प्रियतम को
जैसे करता कोई मनचला उद्दंड.
और फिर मुझ बदकिस्मत को देखें
कैसे कहूँ कहाँ कहाँ उसने है काटा.
जब जब मैंने किया वार घात को
खाना पड़ा अपने मुँह पर ही चाँटा.
देर से जागी पर जागी बुद्धि मेरी
स्मृत हुआ बुजुर्गों से सुना उपाय.
वही किया हमने जो सब हैं करते
भगा दिया दुष्ट को कछुआ जलाय.
जय होगी हमारी निश्चित ही
Aug 21st
जय होगी हमारी निश्चित ही
पर निर्णय लेना होगा यह
कि कितना स्वार्थ समोचित है.
है नही दोष निज उन्नति में
जब तक न पाप समाहित हो
करता यह जन-कल्याण ही है.
यदि शिक्षा एक साधन हो
बस कुटुम्ब पालन का तो
इतर कहाँ हम पशुओं से.
हैं गिले व शिकवे सबको यहाँ
और दोष नहीं है इसमें भी
पर देख तेरे प्रतिदान का अंश.
मानसून हो कि बज़ट
Jun 30th
कितना अच्छा होगा जब
एक ही किताब पढ़ायी जायेगी
दिल्ली से सुदूर गाँव तक.
बिजली का क्या है
दिल्ली में भी कायम नही रहती.
रास्ते में गड्ढे के लिये भी
जरूरी नहीं है किसी गाँव मे होना.
हस्पताल के दरवाजे पर मरने के लिये
कहीं और जाने की जरूरत नहीं.
राख़ आँखों मे उड़ कर गिरे
उसके लिये जरूरी है
कि हवा करो.
या फिर मारो पैर
राख से ढंके आग के ढेर में.
पर कहाँ.
हमें तो आदत हो गयी है
भींगे भींगे से रहने की.
कब फ़र्क पड़ता है
मानसून आया कि नहीं.
या बजट बनायी जाये
सिर्फ़ पूँजीपतियों और वोटों के लिये.
गोया मानसून हो कि बज़ट
घर और सपने तो टूटेंगे ही.
खैर, आप अख़बार पढ़िये
और चलिये, करते हैं
कुछ उम्दा किस्म की बहस.
वह कविता कैसे बनाऊँ मैं
Jun 29th
लगे आपको “अप्रतिम”
वह शब्द कहाँ से लाऊँ मैं.
स्वरचित अज्ञान शिविर में
जब तड़प रहा हूँ हर दिन मैं.
अतुल्य लगे जो पाठक को
और जलाये दीप तिमिर में
वह कविता कैसे बनाऊँ मैं.
शब्द नहीं हैं पास मेरे
भाव गये कब के संग छोड़.
लिखना नहीं चाहता हूँ मैं
पर जब दबते हाथों के पोड़.
बह जाती मसि की इक धार
फिर बिखरते शब्द चहुँ ओर.
लोग कहें कि कविता हो गयी
शर्म से देखूँ मैं तब मुँह मोड़.

आपने कहा