एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
Posts tagged कवितायेँ
हड्डियों का अभाव है
Sep 22nd
रोज देखता हूँ कुछ कुछ रेंगते हुए लोग
और उनसे लिपट कर रेंगते हुए कुछ और लोग.
दिन रात बस उन्हीं से पाला पड़ता है मुझे
मैं भी उनसे डरकर अब रेंगना सीख रहा हूँ.
मुझे याद आता है वो दिन भी
जब जोड़ से पत्थर उठा कर फेंका था
उस कीचड़ उछाल कर जाती कार को.
पर ये तब की बात है जब मैं खड़ा था.
अब तो बस किसी तरह घर से निकलता हूँ
चलते-फिरते या किसी निर्जीव का शिकार करने.
और वापस आ जाता हूँ अपनी मांद में
शुक्र मनाते हुए कि एक दिन और जी लिया.
बचपन में पढ़े हुए जोश और जवानी के किस्से
झूठे हैं, खोखले हैं, बेकार हैं, गुमराह करते हैं
रोज देखता हूँ कि एक से एक बहादुर
रेंग रहे होते हैं मेरे साथ कतारों में.
मैं नहीं कुचला गया किसी कार के नीचे
ना ही किसी गड्ढे में गिरा
जबकि मैं रेंग रहा था सारा दिन.
अब मैंने संभल कर रेंगना सीख लिया है.
धीरे से बिना आवाज अपना ही थूक गटकते
एक और दिन जी लिया यही सोच खुश होते हुए.
काश सबके सब आ जाते किसी चीज के नीचे
पर ऐसा तो तब हो जब कोई खड़ा चलता हो.
शायद अच्छाई हमेशा दूसरों में अच्छी लगती है
Sep 11th
मुझे चाहिये एक अच्छा सा रोजगार
क्योंकि मैं अच्छा पैसा कमाना चाहता हूँ
चाहिये एक अच्छी गाड़ी और एक अच्छा घर
एक अच्छी सी पत्नी और अच्छे बच्चे भी
और इससे अच्छा क्या होगा मेरे लिये?
यूँ तो मुझे तब भी अच्छा लगता है
जब कोई बाजी लगाता है देश के लिये
या हटाता है गली में पसरी गंदगी को
या फिर लड़ता है कहीं अन्याय के खिलाफ़
पर मैं ऐसा नहीं करना चाह्ता
क्योंकि उससे कुछ हासिल नहीं होता.
शायद ऐसा ही खयाल हर दिल में आता होगा.
पर क्या सोचते हैं वे लोग जो फिर भी
कुर्बान जाते हैं कुछ ऐसी अच्छाई पर
जिससे कुछ भी अच्छा नहीं होता उनके लिये.
मैं तो सब कुछ अच्छा पाना चाहता हूँ.
जो दूसरों का ख़याल करता हो
और जिसे परवाह हो
इस दुनिया और दुनिया के लोगों की
देखता हूँ उसे लोग अच्छा तो कहते हैं
पर कुछ भी अच्छा नहीं होता उसके साथ.
कल सुना एक सिपाही मर गया
कुछ घुसपैठियों को रोकने में
पर उसके घर का पहरेदार कौन होगा अब.
उसके पीछे तो एक जवान बीवी
और एक मासूम बच्ची भी है.
शायद अच्छाई हमेशा दूसरों में अच्छी लगती है.
नहीं तो ऐसा न होता कि उन घुसपैठियों को
देश के अंदर के लोग चुन चुन कर
कत्ल कर देते यह सोच कर कि
उन्होंने मारा है हमारे जवान को और
न जाने कितनों को निशाने पर रखा है.
चोरों, पॉकेटमारों और लफंगों को पीटने में
बहुतों ने हाथ आजमाया तो होगा.
पर क्या यह अच्छा नहीं होता कि
हर आदमी आजमाता इन घुसपैठियों पर.
शायद अच्छाई हमेशा दूर से ही अच्छी लगती है.
कुछ पुराने चुटकुले नये अंदाज में
Sep 10th
कितना प्यार तुम्हें करता हूं जानू तुम्हें पता है?
एक दिन मुर्गा जोश में मुर्गी से ऐसा ही कहता है.
मुर्गी थोड़ा शरमायी और फिर थोड़ा इतरायी
और फिर वही “पुरातन सवाल” झट से जा दुहरायी.
“अच्छा मेरे लिए कुछ भी कर सकते हो?”
मुर्गे ने “हाँ” कह अपना सीना ज्यों ही फुलाया.
“अच्छा तो अंडा देकर दिखाओ!” मुर्गी ने फरमाया.
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हुआ गजब एक दिन कुछ ऐसा
अंडा लेने खुद मुर्गी गयी दुकान.
दुकानदार ने अचरज से पूछा
“तुम खुद मुर्गी होकर अंडा लेने क्यूँ आई?
हे सतरंगी दो तुम मुझे इसका जवाब”.
मुर्गी थोड़ा शरमायी, और फिर इतरा के बोली
“मुर्गा कह्ता दो रूपए के अंडे की ख़ातिर,
ना कर अपना फिगर खराब”.
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मालिक ने टोका दफ्तर में महिला को
कपड़े थोड़े ज्यादा पहनो लड़के होते हैं खराब.
महिला ने बस देख के मौका किया तगादा
“क्या करें इतनी सैलरी मे इतना ही आता”.
मालिक ने भी झट इक हुकुम सुनाया
तीन महीने के लिये बंद कर दिया
मैडम जी का तन्खा खाता.
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बनिये ने ग्राहक को हाँकी
“रातों की नींद उड़ जायेगी
इतनी अच्छी है यह किताब”.
ग्राहक सिर हिलाते बोला
क्योंकि मेरे घर है पड़ी लुगाई
इसकी जरूरत नहीं है भाई.
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“बच्चे भगवान का रूप होते हैं उन्हें मारें नहीं”
शिक्षक ने बच्चों के पिता को समझाया.
“फिर तो मैं भगवान का बाप हूँ”
इसका अर्थ यही उसके समझ में आया.
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एक ब्लॉगर ने टिप्पणी पाने का एक सहज उपाय निकाला. उसका ब्लॉग हर आने जाने वाले पाठक को कहता “ऑटोग्राफ प्लीज”. फिर भी जब टिप्पणी की संख्या में बढ़त नहीं हुई तो उसने जानना चाहा कि वे कौन से “र्यूड लोग” हैं जो “इतनी पोलाईटनेस्स” के साथ मांगने पर भी टिप्पणी नहीं देते. पता चला सबके सब ब्लॉगर थे और कुछ गलती से आ टपके थे.
कितना उसने मुझे सताया
Sep 2nd
रात बहुत अंधियारी थी और
इन्द्रदेव का मूड अलग था
नही जानता मैं अज्ञानी कि
प्रसन्नता या कुछ कारण और.
झम झम करके रही नाचती
सुकुमारी बरखा सारी रात.
बिजली रानी के वियोग में
नही सूझते हाथों को हाथ.
बात राज की बतलाऊंगा अब
हँसना ना तुम हे प्रिय सिरमौर.
कल रात स्वामिनी मेरे घर की
करती रही एक उजड्ड संग घुरदौड़.
क्या बतलाऊँ कैसे बतलाऊँ
है कितना उसने मुझे सताया.
आकर मध्य युगल के उसने
कितना उसने हमें जलाया.
हया-दया ना धर्म है उसको
था गाना उसके कान में गाता.
वो तो बस छूने ही वाला था
कि उठकर निकाला मैंने छाता.
हुआ दरअसल ऐसा कुछ मित्रवर
लगी मुझ को भाग्य से लघु शंका.
और हड़क कर दुबका कहीं वो राक्षस
जैसे हनुमान स्वयम् पहुँचे हो लंका.
पर “ढीठ” कहाँ है ऐसे मानते
हो गया शुरू फिर वहीं वह प्रचंड.
चूम ही डाला मेरे प्रियतम को
जैसे करता कोई मनचला उद्दंड.
और फिर मुझ बदकिस्मत को देखें
कैसे कहूँ कहाँ कहाँ उसने है काटा.
जब जब मैंने किया वार घात को
खाना पड़ा अपने मुँह पर ही चाँटा.
देर से जागी पर जागी बुद्धि मेरी
स्मृत हुआ बुजुर्गों से सुना उपाय.
वही किया हमने जो सब हैं करते
भगा दिया दुष्ट को कछुआ जलाय.
जय होगी हमारी निश्चित ही
Aug 21st
जय होगी हमारी निश्चित ही
पर निर्णय लेना होगा यह
कि कितना स्वार्थ समोचित है.
है नही दोष निज उन्नति में
जब तक न पाप समाहित हो
करता यह जन-कल्याण ही है.
यदि शिक्षा एक साधन हो
बस कुटुम्ब पालन का तो
इतर कहाँ हम पशुओं से.
हैं गिले व शिकवे सबको यहाँ
और दोष नहीं है इसमें भी
पर देख तेरे प्रतिदान का अंश.

आपने कहा