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एक बेचारा बादल
Apr 15th
घुम्म्क्कड़, आवारा, एक बादल बेचारा,
संयोग था, दुर्योग था, यह तो पता नहीं.
एक अल्हड़ पहाड़ी से एक दिन टकरा गया,
नादान था, उलझ गया, रहने लगा वो वहीं.
नदियों से, तालाबों से, झरनों व समुद्र से,
लाता है चुन चुन कर खुशबू भरे जल.
नहलाता है खुद से अपनी उस प्यारी को,
रहे रूप उसकी प्रिया का, ऐसे ही अविचल.
हर रोज, शाम से ही, रात बहुत देर तक,
सजाता है वो उसे, बारिश के बूंदों से.
फिर आधी रात में, निहारता थोड़ी दूर से,
छिटकती चांदनी को, अल्हड़ के देह से.
भोर से पहले, वह ओस की बूंदों से,
सजाता है फिर से, उस अल्हड़ पहाड़ी को.
और थोडा हो परे, निहारता है हर सुबह,
उस चिकने, चमकते, स्वर्णिम बदन को.
जी चाहे पहाड़ का, पर यह भी एक प्रेम है.
तभी तो इस अल्हड़ पहाड़ी को भी एक डर है.
सोचती है, क्या भरोसा, यह भी तो बादल है.
मुआ न जाने कब फिर कहीं चला जाता है.
बादल भी समझाता है फिर बड़े प्यार से,
समझा कर मेरे पगली!
मैं जाऊँगा तो फिर चला आऊँगा.
कभी इस रूप में या कभी किसी रूप में.
पर तुम क्यों घबराती हो?
जब तक हो तुम, रहेगा तुम्हारा रूप,
और रहेंगे तुम्हरे चाहने वाले बादल.
चढेगी तेरी जवानी, कभी न ढलने के लिए.
न डरता हूँ तनिक मगर, जरा मेरी सोच,
बादल का जीवन है और पानी की मौत.
जीवन यह मेरा, श्रृंगार तो है ही तेरा,
मरते हुए भी तुझे ही सजा जाऊँगा.
प्रेम तेरे देह पर, कुछ ऐसे लिख जाऊँगा.
होगा बदन तेरा, हरा-भरा श्रृंगार से.
आएंगे अनगिनत बादल,
हर मौसम में सँवारने तुझे प्यार से.
एक बेनाम यादगार मुलाकात
Mar 30th
मिटती नहीं है याद से
जब कहीं दूर अपने घरौंदों से
मिले थे उन्मुक्त भाव से ठंडी सड़क पर
तीखी हवाओं के बीच से
जो चीर कर निकला करती थी छुपी हुई देह को
हम चले थे हाथों में हाथ डाल
बात उस रात की
मिटती नहीं है याद से
जो कहा था तुमने
तुम किसी से खुलती नहीं
इसलिए कि तुमसे कोई खुल कर मिला नहीं
चुप रहना समझ लेती हो बेहतर
और देती हो आजादी उनके विवेक को सोचने का
मिटती नहीं है याद से
यह सोच कि कितना अजीब होगा
तेरे अन्दर का कोलाहल
जो सुन न पाए खुद चुप रहने वाले
मैंने देखी है वह अल्हड़ और शर्माती हंसी
जो जानती है कहाँ जाती है उसकी चोट
और छोड़ जाती है दिल पर खराश
मिटती नहीं है याद से
कि हम मुस्कुराते थे साथ साथ
दुनिया से छुपकर
सिर्फ इसलिए कि कहीं शुबहा न करने लगे लोग
और उन्मुक्त हंसी को दे दें कोई नाम
एक बेनाम यादगार मुलाकात को
मिटती नहीं है याद से
कि छोड़ आया मैं तुम्हे तनहा सुरुरों में
यह सोच कि खलल न पर जाये तुम्हारे ख्वाबों में
और सो न सका कई-कई रात
खुली आँखों से सपना देखते हुए
तुम्हे काले कपडों और सफ़ेद रोशनी के बीच
बिना यह सोचे कि यह तुम्हारा भी सपना या नहीं
मनुहार
Mar 9th
सुबह की अलसाई बेला में जब अंगडाई लेती तुम प्रिये
न पूछ कहाँ किधर कैसे उठती है एक टीस प्रिये.
रात नहीं गुजरी अब तक, मन चंचल फिर हो जाता है
थोड़े ही रसपान से कहीं भंवरे का मन भर आता है.
न चाँद मलिन, न सूरज नभ पर, तारे भी हैं अभी वहीं
अब दूर पडी दीवाल घड़ी भी तो सुस्ताया जाता है.
न देती सुनायी अजान अभी और न घंटी बजी शिवाला की
अब दे न देना तू मुझको इस बार दुहाई सुबह की.
माना हो तुम सुन्दर प्रिय पर देर न करो नवबाला सी
दे मुझको उन्मुक्त सुबह और नशा तुम्हारे हाला की.
कर के जिसका पान प्रिये मैं झूमूं दिन भर आँगन में
मान मेरा कहना तुम आ जाओ अभी आलिंगन में.
अब आ भी जाओ रतिरूपा, करवाओ न मनुहार प्रिये
रहा नहीं जाता अब मुझको दूर तुम्हारे अधरों से.
जो न आयी पास स्वयं तुम, मैं आ जाऊँगा अभी वहीं
बुझती नहीं है प्यास मेरी बस देख तुम्हे अब नजरों से.
नहीं आज नहीं फिर मानूंगा मैं तेरे मीठे तानों से
लिख लेने दो मुझे नाम मेरा इन उठती गिरती सांसों पर.
हार गले ले कर जिनका दिया है जीवन दान सखी
करने दो मुझे अधर-राग उन सुन्दर कोमल बाँहों पर.
तुम ही कहो ना
Feb 10th
तेरे नयना ऐसे सजना
जो ले जाते मेरे चैना
जो ना दिखे तो दिल घबराए
साँस रुके जब सामने आए
ऐसा क्यों हैं तुम ही कहो ना.
लहरों सी हैं तेरी बातें
जैसे वो धारा पर डोलें
मेरा मन भी खाए हिंडोले
चांदनी रात में जब तू बोले
ऐसा क्यों हैं तुम ही कहो ना.
मचल मचल कर दिल दहलाए
जब भी तुम सपने में आए
तुम इतने हो चंचल साथी
जैसे कोई नदी में हाथी
ऐसा क्यों हैं तुम ही कहो ना.
सोते सोते गा लेती हूँ
सो जाती हूँ गाते गाते
दिन तो लगता सपने जैसा
रात हो जैसे साथी अपना
ऐसा क्यों हैं तुम ही कहो ना.
जब तक सजन तुम न आते
तब तक तुम मेरे नींदों में हो
फिर जागें क्यों मेरे नयना
लोग कहें मुझे बावरी सजना
ऐसा क्यों हैं तुम ही कहो ना.

आपने कहा