परिचर्चा

एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग

पुकार

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त्याग कर अभिमान अपना
रख धरा का मान ले तू
पाया बहुत कुछ अभी तक
अब दान की भी ठान ले तू

जी चुका बहुत अभी तक
निज, सखा, संतान खातिर.
मान ले तू, धर्म तेरा
है निज नहीं, संसार-सेवा.

जो जिया है व्यर्थ अभी तक
हो गयी हो क्षीण शक्ति.
माना यह अंतिम प्रहर है
फिर भी  जननी बाट जोहती.

न सोच इतना, चल चला चल
देख है अब साथ कितना.
समीप जीवन का अस्ताचल
क्यों रोकता तू हाथ अपना.

चाह तेरी भी है मानव
जाति तुझको याद रक्खे.
एकांत में  मृत्यु वर कर
क्यों तुझे कोई याद रक्खे.

है नहीं कोई पुकार यह
जो मांगता  तेरा धन अपार है.
मांगता है अंश अवयव
तेरे अनुभवों का समाज है.

अब समय है दान दे तू
और नहीं कुछ, ज्ञान दे तू.
दीन हीन निश्छल पड़े हैं
पशु सदृश तेरे सहोदर.

देख, ठगना उनको सहज है.
सुन, मर्दन उनका महज है.
बता, क्या यह देखना भी
तुझको उतना ही सहज है?

यह उन लोगों के लिए है जो जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त कर अपने उतरार्द्ध में भी समाज सेवा से इसलिए डरते हैं कि कहीं उनके सम्मान या अभिमान को ठेस न पहुंचे. चाहते हैं कि समाज बदले, पर अंहकार आगे आता है. जो दीन है, जो गरीब है उसका तो मात्र अंहकार ही सहारा है, वह अपने को समझा लेता है “गरीब हैं तो क्या हुआ, अपने मन की तो कर ली”. पर आप जो प्रबुद्ध हैं कैसे देख सकते हैं अन्याय होते हुए, उन्हें पशु की तरह जीते हुए. इस सन्दर्भ में एक आलेख लिखा था, समय हो तो उसे भी पढें.

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