मैं सन् १९९४ से सिगरेट पी रहा था, बीच में कई बार छोड़ा भी पर कभी भी पूरी तरह नहीं छूटा. लेकिन इस बार लगभग दो महीने हो गए इस बला को हाथ नहीं लगाया, आप कह सकते हैं कि मुँह नहीं लगाया. मुझे हमेशा से यह लगता था कि मैं इसे तो  जब चाहे छोड़ सकता हूँ, या फिर क्या फर्क पड़ता है. शादी के बाद इस बात के लिए धर्मपत्नी से थोड़ी बहुत अनबन भी होती रही. फिर जैसा कि हर सिगरेट पीने वाले कभी कभी सोचते हैं मैंने भी सोचा कि क्यों न इसे छोड़ ही दिया जाय, सो चलिए छोड़ दिया. More >