एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
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राह चलते बच्चों को लिफ्ट न दें
Apr 6th
बंगलोर में आवासीय क्षेत्रों में आपको बच्चे स्कूटर-मोटरसाइकिल वालों से लिफ्ट मांगते दिखाई दे जायेंगे. शायद ऐसा अन्य शहरों में भी हो. शायद आप में से कुछ लोग सहृदय होकर उन्हें लिफ्ट दे भी देते होंगे.
पर शायद आपने इस पहलू पर गौर ही न किया होगा कि आप कितना बड़ा जोखिम अपने ऊपर ले रहे होते हैं. यदि दुर्योग से आपकी गाड़ी किसी दुर्घटना का शिकार होती है और उसमें वह बच्चा थोड़ा भी आहत होता है या न भी हो और पुलिस आ जाये. और आपसे पूछे कि वह बच्चा कौन है, तो आपको पता है आपकी क्या दशा होगी?
आप पर सीधे-सीधे अपहरण का मामला बन सकता है. फिर आपकी सारी की सारी सहृदयता धरी की धरी रह जायेगी. और जो काम आप छोटी सी भलाई सोच करने चले होंगे वह आपके परिवार की तबाही का कारण बन जायेगी.
मैं सबको नेता बनाना चाहता हूँ
Apr 5th
बड़ी तमना है दिल में अपने गाँव-समाज के लिए कुछ करने की. वास्तव में मैं अपने गाँव, जिले और राज्य को समृद्ध देखना चाहता हूँ. और उसका सीधा-सीधा उपाय यही दिखता है कि सबसे पहले मेरे जैसे लोगों, जिनको भविष्य की जरूरत और रास्ते थोड़े बहुत दिखते हैं, को सड़क पर आना होगा. इसे क्रांति कहें या कुछ और, लेकिन रास्ता एक ही है – “सड़क पर उतरो”. हाथ पैर गंदे करो और हर चीजों को दुरुस्त करो.
तो मुश्किल क्या है? इरादे हैं, हौसले हैं, रास्ते हैं और मैं भी हूँ.
मुश्किल यह है कि मैं यदि अभी चल पड़ा तो मेरे ऊपर आधारित दस जिंदगियां कहाँ जायेंगी? उनको भूखा और उनके भविष्य को आग में झोंक कर तो अन्याय ही करूंगा ना? जिसे जन्म दिया है उसकी चिंता भी तो मेरा ही कर्त्तव्य है. उनको छोड़िए मुझे भी तो आजीविका की जरूरत होगी. जो काम मैं करना चाहता हूँ उसमे भी तो पैसे लगेंगे. कैसे होगा? खाली पेट, नंगे बदन तो काम न होगा. फिर करें क्या? मेरे जैसे व्यक्ति यदि कुछ बड़ा करना भी चाहें तो कैसे करें.
बहुत सोच विचार के बाद एक रास्ता निकला है, समय लगेगा, पर संभव लगता है.
आज से दस साल बाद मेरी पत्नी हमारे घर की जिम्मेदारी उठाने लायक हो जायेंगी. अभी मैं ३५ का हूँ तो ४५ के आस पास जब बच्चे उच्च विद्यालय से बाहर निकल चुके होंगे और दुनियादरी समझने लायक हो जायेंगे, तो मैं पत्नी को घर बार की जिम्मेदारी दे कर समाज की जिम्मेदारी ले सकता हूँ.
बहुत अजीब लगता है इतना कायराना तर्क देते हुए. पर शायद मेरी ही जैसी हालत मेरे हम-उम्रों की है जिनकी अपने देश को बहुत जरूरत है. सबकी मजबूरी भी एक सी होगी. मैं इसीलिए अपने विचार को पोस्ट की शक्ल में डाल कर उनके दिल की बात कहना चाहता हूँ.
मैं चाहता हूँ कि मैं और मेरे हम-उम्र लोग यह स्वीकार करें कि हमारी हमारे समाज को बहुत जरूरत है और हम जितनी जल्दी पारिवारिक जिम्मेदारी निभा कर समाज के लिए तत्पर हों उतना ही सुखी जीवन हमारे बच्चों का होगा. सिर्फ महंगी और ऊंची शिक्षा दिला देने या पैसा कमा कर रख देने से उनका जीवन सुखी नहीं होगा. उन्हें एक चुस्त-दुरुस्त सरकारी तंत्र और मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर भी चाहिए, और भी बहुत कुछ चाहिए होगा.
मेरी एक गुजारिश अपने बुजुर्गों से भी है. जो अवकाश प्राप्त लोग हैं, उनमे बहुतों को भगवान ने ज्ञान, साधन और स्वास्थ्य सब दिए हैं. जिनसे वे समाज में बदलाव ला सकते हैं. मेरा उनसे इतना आग्रह है, आपने भी हमारी तरह सपने देखे होंगे. अपने लिए, अपने बच्चों के लिए, अपने घर के लिए, अपने समाज के लिए, अपने राज्य फिर अपने देश के लिए. तो उठिए सोचिये कि उनमे से कितने सपने आपके पुरे हो गए और कितने बाकी हैं?
अच्छी पढाई कर ली. बच्चों को पढ़ा दिया, उनकी शादियाँ करवा दी, घर-बार भी बनवा दिया. और अब? कहीं आप इंतजार तो नहीं कर रहे? अपनी मृत्यु का?
वैसे तो अभी भी जहाँ पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों में टकराव नहीं आता वहाँ जिम्मेदारी से मुख नहीं मोड़ता हूँ मैं. फिर भी मैं वचन लेता हूँ अपने आप से कि मैं अपने परिवार की मूलभूत आवशयकता पूरी कर के अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह करना शुरू कर दूंगा.
यदि आप अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह कर चुके तो चलिए आपके घर के बाहर का सपना आपको बुला रहा है.
आपका ब्लॉग कंटेंट चोरी हुआ?
Apr 5th
अभी अभी पता चला हरकीरत जी कि कविता उर्दू में नाम बदल कर छाप लिया गया है. ऐसी चोरी के लिए मैंने गूगल किया तो पता चला कि इसी रोकना या ठीक करना इतना कठिन नहीं है.
और हरकीरत जी तो कानूनी दावा भी थोक सकती हैं, इसके लिए उनको किसी वकील का सहारा लेना पड़ेगा. यदि ऐसा कुछ करें तो हमें भी अपने अनुभव से बताएं.
फिलहाल नीचे दिए लिंक पर देखें कि क्या किया जा सकता है.
http://www.eblogtemplates.com/did-someone-copy-your-blog-content/
महिला-पुरुष की बराबरी और थोथी दलीलें
Mar 30th
मैंने देखा है लोगों को महिला-पुरुष की बराबरी की वकालत करते हुए. और कई बार बेवकूफाना सवाल यह होता है कि जब बनाने वाले ने फर्क नहीं किया तो आप कौन होते हैं फर्क करने वाले.
मैं कहता हूँ आप अंधे हैं, बेवकूफ हैं, या कभी दोनों को एक साथ नहीं देखा? “जब बनाने वाले ने फर्क नहीं किया”. अच्छा? यह तो मुझे पता ही न था की महिला और पुरुष की शारीरिक बनावट एक सी होती है. आपने मुझे गधा समझ कर एक दलील दे डाली और मैंने सुन भी लिया. मेरे जैसे और अहमक भाई लोग भी हैं सो आपकी जीत भी हो गयी.
परन्तु मुझे सिर्फ इतना बता दें, कि आपकी किस आँख से महिला-पुरुष में शारीरिक फर्क नहीं दिखता. यदि दिखता है तो यह न कहिये कि बनाने वाले ने फर्क नहीं किया. मुझे तो दोनों के शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर फर्क दिखता है. मैं मानता हूँ कि दोनों में फर्क है और दोनों के कर्त्तव्य और अधिकार क्षेत्र अलग होने चाहिए. सीधी सी बात है अगर मेरे और मेरी पत्नी के ऊपर कोई लाठी लिए दौरा आ रहा हो और यदि मैं अपनी पत्नी के भरोसे लाठी न उठाऊँ तो दोनों की हत्या होने में देर न लगेगी, सो मुझे लाठी उठाने का कर्त्तव्य और अधिकार दोनों स्वयमेव मिल गए. और इस परिस्तिथिजनित अधिकारों और कर्तव्यों का सम्मान होना चाहिए. जो थोथी दलील देने वाले कदापि नहीं सोचते.
मैं सीधे सपाट शब्दों में महिलाओं के लिए संपत्ति और शिक्षा जैसे अधिकारों में बराबरी का हक़ मानता और मांगता हूँ परन्तु उनके कर्तव्यों और कार्य क्षेत्रों पर मैं बराबरी का विरोध करता हूँ. मैं यह भी मानता हूँ कि उनके कर्त्तव्य जीवन के उन क्षेत्रों में ज्यादा होनी चाहिए जहाँ भावनाओं को समझने की जरूरत है. रोजगार सम्बन्ध में भी मैं किसी महिला को सीमा पर बन्दूक ले कर भेज देने के खिलाफ हूँ, वहीं शिक्षा और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में उनका महत्व बढा हुआ देखता हूँ.
मैं बात को ज्यादा न खीचूँगा पर सारांश में यह कहना चाहता हूँ कि महिला और पुरुष दोनों अलग हैं और उनके अधिकार और कर्त्तव्य अलग होने चाहियें. हरेक क्षेत्र में गडद-मड्ड करने से समाज का फायदा के बजाय नुकसान हो जायेगा.
मिथिलाक विकास कोना होएत
Mar 9th
मिथिलाक प्रत्येक व्यक्ति जे बाहर रहैत छथि सम्भवतः वापस आबए चाहैत छथि, मुदा करता की? जतए कतहु रहैत छथि जीविका उपार्जन मे ओझरा कए रहि जाएत छथि आओर यदि ओहि सँ उबरि गेलाह तँ धनोपार्जन मे लागि जाएत छथि। काज ई दुनु सेहो जरूरी छैक।मोन हुनको कचोटैत होयेबे करतन्हि जे मातृभूमि लेल किछ नहि कए पाएब रहल छथि। तथापि किछ लोकन्हि एहन होयेताह जे किछ करए चाहैत होएताह। कोनो व्यवसाय, कोनो नौकरी वा स्वाध्याय। परन्तु एक नजरि अहि पर देल जाऊ जे अवसर कतेक अछि?
हमरा लंदन सँ दिल्ली आबै मे 10 घंटा लगैत अछि मुदा दिल्ली से गाम पहुन्च्बा मे 20 घंटा। छोरु दिल्ली के पटना मात्र 175 किलोमीटर अच्छी मुदा लगभग 8 घंटा लागि जाएत अछि, दरभंगा मात्र 35 किलोमीटर लेकिन लागत दू घंटा । तहु पर यदि राति भय गल तँ रास्ते मे रहै परत। चलू ओहो स्वीकार दु पाई कम्मे कमा कए बच्चा सबहक नीक शिक्षा के सोची तँ युनिवसि॓टी आ विद्यालय केर हालत देखि कए सिहरि जाएत छी।यदि स्वास्थ्यक कोनो समस्या होए तँ कतय जाएब? गाम में तँ डाक्टर भेटता तकर कोनो गारंटी नहि.
ई सम्भव नहि छैक जे परिवारक रिस्क लय कय समाजक उद्धार करय लेल सभ लोकन्हि सहमत होएत. एहन बहुत रास छोट छोट गैप छैक जे ध्यान मंगैत छैक. वास्तव में बहुत स्वार्थी भये कय कही सकैत छी जे यदि कोई कठिन परिस्थिति से उबरि जायेत तँ वापस ओही में नहि जाए चाहत। तथापि एहन कम्मे मैथिल छथि जे गाँव सँ संपर्क निकुन्न कयने छथि.
जे समाज मे रहि रहल छथि यदि हुनका दिक्कत नहि होयेत छन्हि आओर यदि दिक्कत होयेत छन्हि तँ ओ चुप्प छथि तँ बाहर रहनिहार की करताह?
हमरा अंदाज सँ अधिकतर लोक जे बाहर रहैत छैथ कोनो ने कोनो रूपे गाम के मददि करिते छैथ। अधिकांशतः आर्थिक रुपे। तँ यदि अर्थ मददि नहि कए सकैत अछि तँ की मददि करत?
अहाँ कही सकैत छी जे नब विचार मददि करतैक। मुदा विचारक उपयोग लेल बहुत निष्ठा, सकारात्मक सोच आओर अधीर प्रयत्न लग्तैक। दोसर बाहर रहनिहार वाला सँ सोच मिलब सेहो अत्तेक आसान नहि छैक. बेसी काल सुननिहार के ई लागतैक जे छाँटि रहल छथि. हमर कहब जे पहिन प्रयास जे लोकन्हि गाम में रहि रहल छठी हुनका लोकन्हि के करय पड़तन्हि.
गाम विकास नही कएलक ता दोष ककर, पहिल दोष हरदम नागरिक के होएत छैक. हम ई मानैत छी जे ई आसान काज नही छैक. ताहि पर सँ ई बड़का छोटका आओर जाति धर्मक राजनीति जे प्रत्येक गुप्प में घुसि जायेत छैक से अलग. मुदा परिस्तिथि के अनदेखा नहि कएल जायेत सकैत अछि.
एकर निदान हमरा विचार सँ “जागरूकता” थिक. यदि कहुना कय सभ मैथिल के ई बुझायेल जाय सकैत
- जे विकास पहिल प्राथमिकता होएबाक चाही चाहे नेतृत्व कोनो वर्गक हाथ में रहए
- कि सरकारी तंत्र से काज कोना करौल जाए से बुद्धि सभ के बतोल जाए
- कि ग़लत होएत काजक विरोध कोना कएल जाए
- कि शिक्षा सभहक लेल जरूरी छैक ओर ओकरा में कोनो भेद भाव नही राखल जाए
- कि वर्गक भेद सभ काज में नही आनी, पावनि त्यौहार, वियाह दान अलग थिक आओर समाजक विकास अलग
- कि चुनाओ में वोट जातिक नहीं बल्कि उमीदवार के व्यक्तित्व अओर ओकर क्षेत्र के प्रति निष्ठां पर आधारित रहय
- कि सरकार कोण कोण योजना गमक विकास लेल शुरू कयने अछि अओर ओकर प्रगति कोना भये रहल अछि
- कि अधिकारीगण से कोना काज कराओल जाय
- कि मात्र छोट मोट निज स्वार्थ लेल समाजक हित ताक पर नहि राखी
एहन बहुत रास गुप्प छैक जे समाज के विकासक दिश लय जायत.

आपने कहा